Chapter 2 · 72 verses
साङ्ख्ययोग
Sāṅkhya Yoga · The Yoga of Knowledge
Arjuna takes refuge, and Krishna begins: you are not the body — act with evenness, and become steady in wisdom.
अर्जुन शरण लेते हैं और भगवान् आरम्भ करते हैं: तुम शरीर नहीं हो—समतामें स्थित होकर कर्म करो और स्थितप्रज्ञ बनो।
What is happening here?यहाँ क्या हो रहा है?
Krishna rebukes Arjuna's faintheartedness; Arjuna, unable to decide his duty, becomes Krishna's disciple and asks for what is surely good, yet still says 'I will not fight'. Krishna's teaching begins with the distinction between the body and the embodied: the one who dies is not you, so there is no ground for grief (11–30). He then removes Arjuna's fear of sin by pointing to his own duty as a warrior (31–38). Next He introduces samata through karma-yoga: your right is to action, never to its fruit; evenness is yoga (39–53). Arjuna asks about the person of steady wisdom, and Krishna describes how such a one speaks, sits and moves (54–72).
भगवान् अर्जुनकी कायरताको फटकारते हैं; अपने कर्तव्यका निर्णय न कर पानेवाले अर्जुन भगवान्के शिष्य होकर निश्चित कल्याणकी बात पूछते हैं, फिर भी ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ कह देते हैं। भगवान्का उपदेश शरीर और शरीरीके भेदसे आरम्भ होता है: जो मरता है वह तुम नहीं हो, अत: शोक करना अनुचित है (११-३०)। फिर क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे अर्जुनका पापका भय दूर करते हैं (३१-३८)। इसके बाद कर्मयोगके द्वारा समताका वर्णन करते हैं: कर्ममें ही अधिकार है, फलमें कभी नहीं; समत्व ही योग है (३९-५३)। अर्जुन स्थितप्रज्ञके विषयमें पूछते हैं और भगवान् बताते हैं कि वह कैसे बोलता, बैठता और चलता है (५४-७२)।
Why it comes hereयह अध्याय यहाँ क्यों
Swamiji points out that the Gita's teaching starts with the difference between body and embodied, because a seeker who wants his good must first know 'who am I'. Discernment (viveka) is needed on every path — karma, knowledge or devotion — and Sankhya is where discernment is foremost, which is why Krishna begins His teaching with it and the chapter is named Sankhya-yoga. Arjuna's grief comes from lack of discernment; so that is where the cure begins.
स्वामीजी बताते हैं कि गीताका उपदेश शरीर-शरीरीके भेदसे आरम्भ होता है, क्योंकि अपना कल्याण चाहनेवाले साधकके लिये सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि ‘मैं कौन हूँ’। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग—सभी साधनोंमें विवेककी बड़ी आवश्यकता है; सांख्ययोगमें विवेककी मुख्यता है और सांख्ययोगसे ही भगवान्ने उपदेश आरम्भ किया, इसलिये अध्यायका नाम ‘सांख्ययोग’ है। अर्जुनका शोक अविवेकसे है, इसलिये औषध भी वहींसे आरम्भ होती है।
Questions this chapter answersइस अध्यायके प्रश्न
- ?How can I fight Bhishma and Drona, who are worthy of worship? (2.4)मैं पूजनीय भीष्म और द्रोणके साथ कैसे युद्ध करूँ? (२। ४)
- ?Tell me for certain what is good for me — I am your disciple. (2.7)जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह बात मुझसे कहिये—मैं आपका शिष्य हूँ। (२। ७)
- ?What are the marks of one whose wisdom is steady? How does he speak, sit and walk? (2.54)स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता, बैठता और चलता है? (२। ५४)
Central themeमुख्य विषय
Discernment of the self, and evenness in action
शरीर-शरीरीका विवेक और कर्ममें समता
Related ideasसम्बन्धित विषय
Verses to begin withमुख्य श्लोक
I am Your disciple — teach me
मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे शिक्षा दीजिये
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।
Confused about dharma and overpowered by weakness, Arjuna asks for what is decisively good for him and takes refuge in Krishna as His disciple.
कायरतासे दबा और धर्मके विषयमें मोहित अर्जुन निश्चित कल्याणकी बात पूछता है और शिष्य बनकर भगवान्के शरण होता है।
2.13Like childhood, youth and age — so is a new body
जैसे बचपन, जवानी, बुढ़ापा—वैसे ही दूसरा शरीर
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
As the embodied one passes through childhood, youth and old age in this body, so it passes to another body; the steady one is not deluded by this.
जैसे इस शरीरमें बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है; धीर मनुष्य इसमें मोहित नहीं होता।
2.47Your right is to the action — never to its fruit
कर्ममें ही अधिकार है, फलमें कभी नहीं
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
You are free in doing your duty, never in its fruit; do not become the cause of the fruit, nor be attached to inaction.
कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलमें कभी नहीं; तू कर्मफलका हेतु मत बन और कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति न हो।
2.48Evenness itself is Yoga
समत्व ही योग है
योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
Giving up attachment, staying even in success and failure, established in Yoga, do your work — for evenness is called Yoga.
आसक्तिका त्याग करके, सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर, योगमें स्थित हुआ कर्म कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।
2.55Drop every desire, content in the Self
सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग, अपने-आपमें सन्तोष
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
When a person completely gives up all desires that come into the mind and is content in himself, by himself, he is called steady in wisdom.
जब साधक मनमें आयी सम्पूर्ण कामनाओंका भलीभाँति त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
2.62The chain of fall begins in thought
पतनकी सीढ़ी चिन्तनसे शुरू होती है
ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते।
Dwelling on objects breeds attachment; attachment breeds desire; and when desire is obstructed, anger arises.
विषयोंका चिन्तन करनेसे उनमें आसक्ति, आसक्तिसे कामना और कामनामें बाधा लगनेपर क्रोध पैदा होता है।
The journeyअध्यायकी यात्रा
72 verses, in 6 movements — following how Swamiji links each verse to the one before.72 श्लोक, 6 प्रकरणोंमें — स्वामीजीके ‘सम्बन्ध’ के अनुसार।
- 1
- 2.1The great warrior, in tearsमहान् शूरवीरकी आँखोंमें आँसूतं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।वैसी कायरतासे व्याप्त हुए उन अर्जुनके प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं (और) आँसुओंके कारण जिनके नेत्रोंकी देखनेकी शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन यह (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।
- 2.2Where has this weakness come from?यह कायरता कहाँसे आ गयी?कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।हे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, (जिसका कि) श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, (जो) स्वर्गको देनेवाली नहीं है (और) कीर्ति करनेवाली भी नहीं है।
- 2.3Cast off this petty weakness — stand upतुच्छ दुर्बलता छोड़कर खड़े हो जाओक्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।हे पृथानन्दन अर्जुन! इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो; (क्योंकि) तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परन्तप! हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके (युद्धके लिये) खड़े हो जाओ।
- 2.4How can I fight those I should worship?पूजनीयोंसे युद्ध कैसे करूँ?कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।हे मधुसूदन! मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे कैसे युद्ध करूँ? (क्योंकि) हे अरिसूदन! (ये) दोनों ही पूजाके योग्य हैं।
- 2.5Better to beg than to kill my teachersगुरुजनोंको मारनेसे भिक्षा श्रेष्ठगुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर इस लोकमें (मैं) भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ (समझता हूँ); क्योंकि गुरुजनोंको मारकर यहाँ रुधिरप्रदिग्धान ् = रक्तसे सने हुए (तथा) धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा!
- 2.6I cannot tell which is betterकौन-सा श्रेष्ठ है, नहीं जानतान चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु:।(हम) यह भी नहीं जानते (कि) हमलोगोंके लिये (युद्ध करना और न करना—इन) दोनोंमेंसे कौन-सा अत्यन्त श्रेष्ठ है अथवा (हम उन्हें) जीतेंगे या (वे) हमें जीतेंगे। जिनको मारकर (हम) जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी (हमारे) सामने खड़े हैं।
- 2.7I am Your disciple — teach meमैं आपका शिष्य हूँ, मुझे शिक्षा दीजियेकार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।कायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला (और) धर्मके विषयमें मोहित अन्त:-करणवाला (मैं) आपसे पूछता हूँ (कि) जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह (बात) मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।
- 2.8No kingdom can dry up this griefकोई राज्य यह शोक नहीं मिटा सकतान हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।कारण कि पृथ्वीपर धन-धान्य-समृद्ध (और) शत्रुरहित राज्य तथा (स्वर्गमें) देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, (वह) दूर हो जाय (—ऐसा मैं) नहीं देखता हूँ।
- 2.9'I will not fight' — and silence‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—और मौनएवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप।हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र! ऐसा कहकर निद्राको जीतनेवाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्दसे ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ ऐसा साफ-साफ कहकर चुप हो गये।
- 2.10Krishna, as if smiling, begins to speakहँसते हुए-से भगवान् बोलेतमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत।हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुए-से भगवान् हृषीकेश यह (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।
- 2
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अवतरणिका · Swamiji’s introduction
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीNext chapter · 43 verses
कर्मयोग
Why Act at All?
कर्म क्यों करें?