Chapter 18 · 78 verses
मोक्षसन्न्यासयोग
Mokṣa-Sannyāsa Yoga · The Yoga of Liberation and Renunciation
The whole Gita gathered into one call: take refuge in Me alone.
सम्पूर्ण गीताका सार—केवल मेरी शरणमें आ जा।
What is happening here?यहाँ क्या हो रहा है?
Since Krishna spoke of the two paths, Sankhya and yoga (2.39, 3.3), Arjuna had wanted to understand each one separately, but found no chance to ask until now. He asks the essence of sannyasa and of tyaga. Krishna gives the views of others and then His own: sacrifice, charity and austerity are never to be given up; there are three kinds of renunciation; in Sankhya, action has five causes, and the self is not the doer. He sets out the three kinds of knowledge, action, doer, intellect, steadfastness and happiness, then the natural duties of the four varnas as worship of God, the path to Brahman and supreme devotion, and finally surrender, which culminates in ‘take refuge in Me alone’. Arjuna declares his delusion gone and Sanjaya concludes.
दूसरे अध्यायके उनतालीसवें और तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कही सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठाके तत्त्वको अलग-अलग जाननेकी इच्छा अर्जुनके मनमें थी, पर तीसरेसे सत्रहवें अध्यायतक उसे प्रकट करनेका अवसर नहीं मिला। अब अर्जुन संन्यास और त्यागका तत्त्व पूछते हैं। भगवान् दूसरे विद्वानोंके मत बताकर अपना निश्चय कहते हैं कि यज्ञ, दान, तपका त्याग नहीं करना चाहिये; तीन प्रकारका त्याग, सांख्यमें कर्मोंके पाँच हेतु और आत्माका अकर्तापन बताते हैं। फिर ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके तीन-तीन भेद, चारों वर्णोंके स्वभावज कर्मोंसे भगवान्का पूजन, ब्रह्मप्राप्ति और पराभक्ति, और अन्तमें शरणागति—‘मामेकं शरणं व्रज’—का वर्णन है। अर्जुन मोह नष्ट होनेकी घोषणा करते हैं और संजय उपसंहार करते हैं।
Why it comes hereयह अध्याय यहाँ क्यों
Swamiji’s introduction: just as Krishna found no occasion until chapter 16 to describe the divine and demonic natures, Arjuna found none from chapter 3 to 17 to ask about the two paths. After chapter 17 he finally asks. The chapter is named ‘Moksha-Sannyasa’ because its main subject is devotion to God, in which even liberation is renounced.
अवतरणिकाके अनुसार जैसे भगवान्को सोलहवें अध्यायसे पहले दैवी-आसुरी सम्पत्ति कहनेका अवसर नहीं मिला, वैसे ही अर्जुनको तीसरेसे सत्रहवें अध्यायतक दोनों निष्ठाओंके विषयमें जिज्ञासा प्रकट करनेका अवसर नहीं मिला; अब वे पूछते हैं। जिसमें मोक्षका भी संन्यास (त्याग) हो जाता है, ऐसी भगवद्भक्तिका वर्णन मुख्य होनेसे इस अध्यायका नाम ‘मोक्षसंन्यासयोग’ है।
Questions this chapter answersइस अध्यायके प्रश्न
- ?What is the essential truth of sannyasa and of tyaga, each separately?संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग क्या है?
- ?How can one’s natural work itself become worship of God?अपने स्वभावज कर्मसे भगवान्का पूजन कैसे हो?
- ?What is the most secret essence of the whole teaching?पूरे उपदेशका सबसे गोपनीय सार क्या है?
- ?Has your delusion born of ignorance been destroyed?क्या तुम्हारा अज्ञानसे उत्पन्न मोह नष्ट हुआ?
Central themeमुख्य विषय
Renunciation, one’s own duty and complete surrender
त्याग, स्वधर्म और सर्वथा शरणागति
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Verses to begin withमुख्य श्लोक
Worship Him through your own work
अपने कर्मसे परमात्माका पूजन
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
By worshipping, through one’s own work, Him from whom all beings arise and by whom all this is pervaded, a person attains perfection.
जिस परमात्मासे सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिससे यह सब व्याप्त है, उसका अपने कर्मसे पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
18.47One’s own duty, though imperfect, is better
गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
One’s own dharma, even without merit, is better than another’s done well; doing the work set by one’s own nature, one incurs no sin.
अच्छी तरह किये परधर्मसे गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है; स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
18.61The Lord in the heart turns all beings riding the body-machine
हृदयस्थ ईश्वर यन्त्रारूढ़ प्राणियोंको घुमाता है
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
The Lord dwells in every heart and, by His power, turns all beings riding the body-machine, according to their nature.
ईश्वर सब प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ प्राणियोंको उनके स्वभावके अनुसार घुमाता है।
18.62Take refuge in Him with your whole being
सर्वभावसे उसीकी शरणमें जा
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
Go to Him alone for refuge with your whole being; by His grace you will attain supreme peace and the eternal abode.
सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें जा; उसकी कृपासे परम शान्ति और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।
18.65Be Mine: mind, worship and bow to Me, and you will come to Me
मेरा भक्त हो, मुझमें मन लगा—तू मुझे ही प्राप्त होगा
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
Be My devotee, fix your mind on Me, worship Me, bow to Me; you will come to Me, I promise, for you are dear.
मेरा भक्त, मुझमें मनवाला, मेरा पूजन करनेवाला हो और मुझे नमस्कार कर; तू मुझे ही प्राप्त होगा—यह सत्य प्रतिज्ञा है, क्योंकि तू मेरा प्रिय है।
18.66Leave the support of all dharmas and take refuge in Me alone
सब धर्मोंका आश्रय छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
Giving up reliance on all dharmas, come to Me alone for refuge. I will free you from all sins; do not grieve.
सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ जा; मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।
The journeyअध्यायकी यात्रा
78 verses, in 8 movements — following how Swamiji links each verse to the one before.78 श्लोक, 8 प्रकरणोंमें — स्वामीजीके ‘सम्बन्ध’ के अनुसार।
- 1
- 18.1सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! (मैं) संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
- 18.2काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदु:।(कई) विद्वान् काम्य कर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं (और) (कई)विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् ऐसा (कहते हैं कि) यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
- 18.3त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:।(कई) विद्वान् काम्य कर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं (और) (कई)विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् ऐसा (कहते हैं कि) यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
- 18.4निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! (तू) संन्यास और त्याग —इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।
- 18.5यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, (प्रत्युत) उनको तो करना ही चाहिये; (क्योंकि) यज्ञ, दान और तप—ये तीनों ही (कर्म) मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।
- 18.6एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।हे पार्थ! इन (यज्ञ, दान और तपरूप) कर्मोंको तथा (दूसरे) भी (कर्मोंको) आसक्ति और फलोंकी इच्छाका त्याग करके करना चाहिये— यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।
- 18.7नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते।नियत कर्मका तो त्याग करना उचित नहीं है। उसका मोहपूर्वक त्याग करना तामस कहा गया है।
- 18.8दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।जो कुछ कर्म है, (वह) दु:खरूप ही है— ऐसा (समझकर कोई) शारीरिक परिश्रमके भयसे (उसका) त्याग कर दे, (तो) वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।
- 18.9कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।हे अर्जुन! ‘केवल कर्तव्यमात्र करना है’— ऐसा (समझकर) जो शास्त्रविहित कर्म आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
- 18.10न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।(जो) अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता (और) कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, (वह) त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित (और) अपने स्वरूपमें स्थित है।
- 18.11न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषत:।कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है— ऐसा कहा जाता है।
- 18.12अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मण: फलम्।कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित— (ऐसे) तीन प्रकारका फल मरनेके बाद (भी) होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।
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