Chapter 18 · Verse 3(with 18.2)
Bhagavad Gita 18.3
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:।
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥ ३॥
tyājyaṃ doṣavadityeke karma prāhurmanīṣiṇaḥ।
yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāpare॥ 3॥
हिन्दी
साधक-संजीवनी · 18.2–3(कई) विद्वान् काम्य कर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं (और) (कई)विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् ऐसा (कहते हैं कि) यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।
English
Sadhaka-Sanjivani · 18.2–3The Blessed Lord said: The wise,understand by Sannyasa, the givingup ofall actions, prompted by desire; the learned, declare the abandonment of the fruits of all actions as Tyaga, Some philosophers declare, that actions should be given up as an evil, while others say, that acts of sacrifice, charity and penance, are not to be given up.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीअर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं। श्रीभगवानुवाच
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- कवय:
- (कई) विद्वान्
- काम्यानाम्
- काम्य
- कर्मणाम्
- कर्मोंके
- न्यासम्
- त्यागको
- सन्न्यासम्
- संन्यास
- विदु:
- समझते हैं (और)
- विचक्षणा:
- (कई)विद्वान्
- सर्वकर्मफलत्यागम्
- सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको
- त्यागम्
- त्याग
- प्राहु:
- कहते हैं।
- एके
- कई
- मनीषिण:
- विद्वान्
- इति
- ऐसा
- प्राहु:
- कहते हैं कि
- कर्म
- कर्मोंको
- दोषवत्
- दोषकी तरह
- त्याज्यम्
- छोड़ देना चाहिये
- च
- और
- अपरे
- कई विद्वान्
- इति
- ऐसा (कहते हैं कि)
- यज्ञदानतप:कर्म
- यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका
- न, त्याज्यम्
- त्याग नहीं करना चाहिये।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीदार्शनिक विद्वानोंके चार मत हैं—
१-‘काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयोविदु:’—कई विद्वान् कहते हैं कि काम्य-कर्मोंके त्यागका नाम ‘संन्यास’ है अर्थात् इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनका त्याग करनेका नाम ‘संन्यास’ है।
Verse 3 of 78 in chapter 18