Chapter 2 · Verse 31
Look at your own duty too — do not waverस्वधर्मको देखकर भी विचलित मत हो
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धम्र्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥ ३१॥
svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi।
dhamryāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate॥ 31॥
हिन्दी
साधक-संजीवनीऔर अपने क्षात्रधर्मको देखकर भी (तुम्हें) विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।
English
Sadhaka-SanjivaniLooking at your own duty as well, you should not falter for there is, nothing more meritorious to a person of the warrior class (Ksatriya) than a righteous war.
The ideaमूल बात
Summary based on Sadhak Sanjivaniसाधक-संजीवनीपर आधारित सारEven considering your own duty you should not waver, for nothing is more beneficial for a kshatriya than a righteous war.
अपने स्वधर्मको देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिये; धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कल्याणकारक कर्म नहीं है।
What is Krishna saying?भगवान् क्या कह रहे हैं?
Arjuna had two troubles: grief over losing his relatives and fear of the sin of killing his elders. Verses 11-30 removed the grief; from here to verse 38 Krishna removes the fear through svadharma. Swamiji explains that whatever a person takes himself to be — by varna, as teacher or servant, as father or son — the duty of that role is his svadharma. For Arjuna as a kshatriya it is not to turn away from battle. Arjuna had asked for what is truly good for him (2.7); Krishna answers that the good comes only from doing one's own duty.
अर्जुनके मनमें कुटुम्बियोंके मरनेका शोक और गुरुजनोंको मारनेके पापका भय था। शोक दूर करनेके लिये ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतकका प्रकरण कहा, अब भय दूर करनेके लिये क्षात्रधर्मका प्रकरण आरम्भ करते हैं। मनुष्य अपनेको जो कुछ मानता है—ब्राह्मण, क्षत्रिय, शिक्षक, नौकर, पिता, पुत्र—उसका कर्तव्य उसका स्वधर्म है। अर्जुनने सातवें श्लोकमें निश्चित श्रेय पूछा था; भगवान् कहते हैं कि श्रेय अपने धर्मका पालन करनेसे ही होगा।
Step by stepक्रमसे
- 1
Discrimination is about knowing; svadharma is about doing. For one who cannot grasp body-Self discrimination, doing one's duty leads to the same truth.
विवेकमें 'जानना' मुख्य है और स्वधर्मपालनमें 'करना'। जो देह-देहीका विवेक न समझ सके, वह स्वधर्मपालनसे वही तत्त्व पा सकता है।
- 2
What is attained through jnana-yoga can also be attained through karma-yoga.
ज्ञानयोगसे जो अनुभव होता है, वही कर्मयोगसे भी हो सकता है।
- 3
Kshatriya duty here stands for the duty of every varna; each should understand his own.
यहाँ क्षात्रधर्म चारों वर्णोंका उपलक्षण है; सबको अपना-अपना धर्म समझ लेना चाहिये।
- 4
Acting for others' good, giving up selfishness, pride and desire for results, is svadharma — and that is karma-yoga.
स्वार्थ, अभिमान और फलेच्छाका त्याग करके दूसरेके हितके लिये कर्म करना स्वधर्म है; स्वधर्मका पालन ही कर्मयोग है।
Think about itविचार कीजिये
Examples Swamiji gives in the commentaryव्याख्यामें स्वामीजीके दृष्टान्तTeacher, servant, father, son
शिक्षक, नौकर, पिता, पुत्र
One who takes himself to be a teacher or a servant has the duties of that role as his svadharma; one who takes himself to be someone's father or son has the duties owed to that son or father.
जो अपनेको शिक्षक या नौकर मानता है, उसके लिये उसका कर्तव्य स्वधर्म है; जो अपनेको पिता या पुत्र मानता है, उसके लिये पुत्र या पिताके प्रति कर्तव्य स्वधर्म है।
कोई अपनेको शिक्षक या नौकर मानता है तो शिक्षक या नौकरके कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको किसीका पिता या किसीका पुत्र मानता है, तो पुत्र या पिताके प्रति किये जानेवाले कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है।What could this look like today?आज यह कैसा दिखेगा?
Modern analogy · not from the sourceआधुनिक उदाहरण · मूल ग्रन्थसे नहींcareer
A doctor on night shift may feel like walking out of a hard case. Svadharma asks: given the role I have accepted, what is my duty right now — and to do it for the patient's good, not for reward.
रात्रि-ड्यूटीपर डॉक्टरका मन कठिन केससे हटना चाहे, तब स्वधर्म पूछता है: जो भूमिका मैंने स्वीकार की है, उसमें अभी मेरा कर्तव्य क्या है—और उसे मरीजके हितके लिये करना।
family
As a son or daughter, your duty toward your parents is your svadharma, whatever others in the family do.
पुत्र या पुत्रीके रूपमें माता-पिताके प्रति आपका कर्तव्य ही आपका स्वधर्म है, दूसरे चाहे जो करें।
Why it mattersयह क्यों महत्त्वपूर्ण है
It gives a path for those who cannot yet live the discrimination of body and Self: doing one's own duty selflessly leads to the same goal.
जो अभी देह-देहीका विवेक न कर सकें, उनके लिये मार्ग है: निःस्वार्थभावसे अपने कर्तव्यका पालन उसी लक्ष्यतक पहुँचा देता है।
Key Sanskrit wordsमुख्य शब्द
- स्वधर्मम्
- one's own dutyअपना धर्म (क्षात्रधर्म)
- अवेक्ष्य
- consideringदेखकर
- विकम्पितुम्
- to waver from dutyकर्तव्यसे विचलित होना
- धर्म्यात् युद्धात्
- than a righteous warधर्ममय युद्धसे
- श्रेयः
- that which brings true goodकल्याणकारक
Ready for the full explanation? Swamiji explains each phrase of the verse in detail.पूरी व्याख्या पढ़ें — स्वामीजी श्लोकके प्रत्येक पदका विस्तारसे अर्थ बताते हैं।
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Verse 2.31
Verses Swamiji connects to this oneजुड़े हुए श्लोक
I am Your disciple — teach me
मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे शिक्षा दीजिये
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।
Confused about dharma and overpowered by weakness, Arjuna asks for what is decisively good for him and takes refuge in Krishna as His disciple.
कायरतासे दबा और धर्मके विषयमें मोहित अर्जुन निश्चित कल्याणकी बात पूछता है और शिष्य बनकर भगवान्के शरण होता है।
18.43शौर्यं
शूरवीरता, तेज, धैर्य प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता तथा युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव (—ये सब-के-सब) क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।
18.47One’s own duty, though imperfect, is better
गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ
श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
One’s own dharma, even without merit, is better than another’s done well; doing the work set by one’s own nature, one incurs no sin.
अच्छी तरह किये परधर्मसे गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है; स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
5.4साङ्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग (फलवाले) कहते हैं, न कि पण्डितजन; (क्योंकि) (इन दोनोंमेंसे) एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित (मनुष्य) दोनोंके फलरूप (परमात्माको) प्राप्त कर लेता है।
5.5यत्साङ्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। (अत:) जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है, वही (ठीक) देखता है।
18.42शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
मनका निग्रह करना; इन्द्रियोंको वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधिको अनुभवमें लाना और परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिकभाव रखना— (ये सब-के-सब) ही ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।
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