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Indian PhilosophyOS

Chapter 9 · Verse 4(with 9.5)

Bhagavad Gita 9.4

मया

ततमिदं

सर्वं

जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:॥ ४॥

mayā

tatamidaṃ

sarvaṃ

jagadavyaktamūrtinā।

matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṃ teṣvavasthitaḥ॥ 4॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी · 9.4–5

यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा (वे) प्राणी (भी) मुझमें स्थित नहीं हैं— मेरे (इस) ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामथ्र्य-) को देख। सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और प्राणियोंका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।

English

Sadhaka-Sanjivani · 9.4–5

The English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

इस अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस राजविद्याकी महिमा कही गयी है, अब आगेके दो श्लोकोंमें उसीका वर्णन करते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

इदम्
यह
सर्वम्
सब
जगत्
संसार
मया
मेरे
अव्यक्तमूर्तिना
निराकार स्वरूपसे
ततम्
व्याप्त है।
सर्वभूतानि
सम्पूर्ण प्राणी
मत्स्थानि
मुझमें स्थित हैं;
च
परन्तु
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
न, अवस्थित:
स्थित नहीं हूँ
च
तथा
भूतानि
(वे) प्राणी (भी)
मत्स्थानि
मुझमें स्थित
न
नहीं हैं—
मे
मेरे (इस)
ऐश्वरम्
ईश्वर-सम्बन्धी
योगम्
योग-(सामथ्र्य-) को
पश्य
देख।
भूतभावन:
सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला
च
और
भूतभृत्
प्राणियोंका धारण, भरण-पोषण करनेवाला
मम
मेरा
आत्मा
स्वरूप
भूतस्थ:
उन प्राणियोंमें स्थित
न
नहीं है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~9 min read · 21 paragraphs

‘मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’— मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे जिसका ज्ञान होता है, वह भगवान्का व्यक्तरूप है और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है अर्थात् मन आदि जिसको नहीं जान सकते, वह भगवान्का अव्यक्तरूप है। यहाँ भगवान्ने ‘मया’ पदसे व्यक्त- (साकार-) स्वरूप और ‘अव्यक्तमूर्तिना’ पदसे अव्यक्त- (निराकार-) स्वरूप बताया है। इसका तात्पर्य है कि भगवान् व्यक्तरूपसे भी हैं और अव्यक्तरूपसे भी हैं। इस प्रकार भगवान्की यहाँ व्यक्त-अव्यक्त (साकार-निराकार) कहनेकी गूढ़ाभिसन्धि समग्ररूपसे है अर्थात् सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदिका भेद तो सम्प्रदायोंको लेकर है, वास्तवमें परमात्मा एक हैं। ये सगुण-निर्गुण आदि एक ही परमात्माके अलग-अलग विशेषण हैं, अलग-अलग नाम हैं।

गीतामें जहाँ सत्-असत्, शरीर-शरीरीका वर्णन किया गया है, वहाँ जीवके वास्तविक स्वरूपके लिये आया है—‘येन सर्वमिदं ततम्’ (२। १७); क्योंकि यह परमात्माका साक्षात् अंश होनेसे परमात्माके समान ही सर्वत्र व्यापक है अर्थात् परमात्माके साथ इसका अभेद है। जहाँ सगुण-निराकारकी उपासनाका वर्णन आया है, वहाँ बताया है—‘येन सर्वमिदं ततम्’ (८। २२), जहाँ कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन बताया है, वहाँ भी कहा है— ‘येन सर्वमिदं ततम्’ (१८। ४६)। इन सबके साथ एकता करनेके लिये ही भगवान् यहाँ कहते हैं—‘मयाततमिदं सर्वम्।’

Verse 4 of 34 in chapter 9