Skip to content
Indian PhilosophyOS

Chapter 9 · Verse 3

Bhagavad Gita 9.3

अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवत्र्मनि॥ ३॥

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa।

aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravatrmani॥ 3॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

हे परन्तप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

English

Sadhaka-Sanjivani

People devoid of faith in this Dharma, fail to reach Me, O oppressor of the foes, and they whirl in the path of the world of death Le., they remain caught up in the recurring cycle of births and deaths.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

ऐसी सुगम और सर्वोपरि विद्याके होनेपर भी लोग उससे लाभ क्यों नहीं उठा रहे हैं? इसपर कहते हैं—

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

परन्तप
हे परन्तप!
अस्य
इस
धर्मस्य
धर्मकी महिमापर
अश्रद्दधाना:
श्रद्धा न रखनेवाले
पुरुषा:
मनुष्य
माम्
मुझे
अप्राप्य
प्राप्त न होकर
मृत्युसंसार-
मृत्युरूप
वत्र्मनि
संसारके मार्गमें
निवर्तन्ते
लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~8 min read · 14 paragraphs

**‘अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य* परन्तप’— धर्म दो तरहका होता है—स्वधर्म और परधर्म। मनुष्यका जो अपना स्वत:सिद्ध स्वरूप है, वह उसके लिये स्वधर्म है और प्रकृति तथा प्रकृतिका कार्यमात्र उसके लिये परधर्म है—‘संसारधर्मैरविमुह्यमान:’ (श्रीमद्भा० ११। २। ४९)। पीछेके दो श्लोकोंमें भगवान्ने जिस विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा की और राजविद्या आदि आठ विशेषण देकर जिसका बड़ा माहात्म्य बताया, उसीको यहाँ ‘धर्म’ कहा गया है। इस धर्मके माहात्म्यपर श्रद्धा न रखनेवाले अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंको सच्चा मानकर उन्हींमें रचे-पचे रहनेवाले मनुष्योंको यहाँ ‘अश्रद्दधाना:’** कहा गया है।

यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि मनुष्य अपने शरीरको, कुटुम्बको, धन-सम्पत्ति-वैभवको नि:सन्देह-रूपसे उत्पत्ति-विनाशशील और प्रतिक्षण परिवर्तनशील जानते हुए भी उनपर विश्वास करते हैं, श्रद्धा करते हैं, उनका आश्रय लेते हैं। वे ऐसा विचार नहीं करते कि इन शरीरादिके साथ हम कितने दिन रहेंगे और ये हमारे साथ कितने दिन रहेंगे? श्रद्धा तो स्वधर्मपर होनी चाहिये थी, पर वह हो गयी परधर्मपर!

Verse 3 of 34 in chapter 9