Chapter 9 · Verse 2
Bhagavad Gita 9.2
राजविद्या
राजगुह्यं
पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धम्र्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥ २॥
rājavidyā
rājaguhyaṃ
pavitramidamuttamam।
pratyakṣāvagamaṃ dhamryaṃ susukhaṃ kartumavyayam॥ 2॥
हिन्दी
साधक-संजीवनीयह (विज्ञानसहित ज्ञान अर्थात् समग्ररूप) सम्पूर्ण विद्याओंका राजा (और) सम्पूर्ण गोपनीयोंका राजा है। यह अति पवित्र (तथा) अतिश्रेष्ठ है (और) इसका फल भी प्रत्यक्ष है। यह धर्ममय है, अविनाशी है (और) करनेमें बहुत सुगम है अर्थात् इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है।
English
Sadhaka-SanjivaniThis lmowledge(Jiana) with realization, is the sovereign of sciences, and mysterious, and is, supremely holy, most excellent, directly realizable (attendant with virtuejvery easy to practise and is imperishable.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीपूर्वश्लोकमें विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके उसका परिणाम अशुभसे मुक्त होना बताया। अब आगेके श्लोकमें उसी विज्ञानसहित ज्ञानकी महिमाका वर्णन करते हैं।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- इदम्
- यह (विज्ञानसहित ज्ञान अर्थात् समग्ररूप)
- राजविद्या
- सम्पूर्ण विद्याओंका राजा (और)
- राजगुह्यम्
- सम्पूर्ण गोपनीयोंका राजा है।
- पवित्रम्
- यह अति पवित्र (तथा)
- उत्तमम्
- अतिश्रेष्ठ है (और)
- प्रत्यक्षावगमम्
- इसका फल भी प्रत्यक्ष है।
- धम्र्यम्
- यह धर्ममय है,
- अव्ययम्
- अविनाशी है (और)
- कर्तुम्
- करनेमें
- सुसुखम्
- बहुत सुगम है अर्थात् इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी‘राजविद्या’—यह विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्ण विद्याओंका राजा है; क्योंकि इसको ठीक तरहसे जान लेनेके बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता।
भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें कहा है कि ‘मेरे समग्ररूपको जाननेके बाद जानना कुछ बाकी नहीं रहता।’ पन्द्रहवें अध्यायके अन्तमें कहा है कि ‘जो असम्मूढ़ पुरुष मेरेको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम जानता है, वह सर्ववित् हो जाता है अर्थात् उसको जानना कुछ बाकी नहीं रहता’, इससे ऐसा मालूम होता है कि भगवान्के सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्त आदि जितने स्वरूप हैं, उन सब स्वरूपोंमें भगवान्के सगुण-साकार स्वरूपकी बहुत विशेष महिमा है।
Verse 2 of 34 in chapter 9