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Indian PhilosophyOS

Chapter 12 · Verse 7

Bhagavad Gita 12.7

तेषामहं

समुद्धर्ता

मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥ ७॥

teṣāmahaṃ

samuddhartā

mṛtyusaṃsārasāgarāt।

bhavāmi nacirātpārtha mayyāveśitacetasām॥ 7॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

हे पार्थ! मुझमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।

English

Sadhaka-Sanjivani

To those whose mind is fixed on Me, I straightway deliver them from the ocean of the death-bound world, O Partha (Arjuna).

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

पार्थ
हे पार्थ!
मयि
मुझमें
आवेशित-चेतसाम्
आविष्ट चित्तवाले
तेषाम्
उन भक्तोंका
अहम्
मैं
मृत्युसंसार-सागरात्
मृत्युरूप संसार-समुद्रसे
नचिरात्
शीघ्र ही
समुद्धर्ता
उद्धार करनेवाला
भवामि
बन जाता हूँ।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~2 min read · 5 paragraphs

‘तेषामहं समुद्धर्ता..........मय्यावेशित-चेतसाम्’—जिन साधकोंका लक्ष्य, उद्देश्य, ध्येय भगवान् ही बन गये हैं और जिन्होंने भगवान्में ही अनन्य प्रेमपूर्वक अपने चित्तको लगा दिया है तथा जो स्वयं भी भगवान्में ही लग गये हैं, उन्हींके लिये यहाँ ‘मय्यावेशितचेतसाम्’ पद आया है।

जैसे समुद्रमें जल-ही-जल होता है, ऐसे ही संसारमें मौत-ही-मौत है। संसारमें उत्पन्न होनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो कभी क्षणभरके लिये भी मौतके थपेड़ोंसे बचती हो अर्थात् उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण मौतके तरफ ही जा रही है। इसलिये संसारको ‘मृत्यु-संसार-सागर’ कहा गया है।

Verse 7 of 20 in chapter 12