Skip to content
Indian PhilosophyOS

Chapter 12 · Verse 6

Bhagavad Gita 12.6

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परा:।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥ ६॥

ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi sannyasya matparāḥ।

ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate॥ 6॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

परन्तु जो सम्पूर्ण कर्मोंको मेरे अर्पण करके (और) मेरे परायण होकर अनन्य- योग-(सम्बन्ध-) से मेरा ही ध्यान करते हुए (मेरी) उपासना करते हैं।

English

Sadhaka-Sanjivani

But those, who worship Me, surrendering all action to Me, regarding Me as the supreme goal, meditating on Me, with single- minded devotion.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

तु
परन्तु
ये
जो
सर्वाणि
सम्पूर्ण
कर्माणि
कर्मोंको
मयि
मेरे
सन्न्यस्य
अर्पण करके (और)
मत्परा:
मेरे परायण होकर
अनन्येन
अनन्य-
योगेन
योग-(सम्बन्ध-) से
माम्
मेरा
एव
ही
ध्यायन्त:
ध्यान करते हुए
उपासते
(मेरी) उपासना करते हैं।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~4 min read · 20 paragraphs

[ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने अनन्य भक्तके लक्षणोंमें तीन विध्यात्मक (‘मत्कर्मकृत्’, ‘मत्परम:’ और ‘मद्भक्त:’) और दो निषेधात्मक (‘संगवर्जित:’ और ‘निर्वैर:’) पद दिये थे। उन्हीं पदोंका संकेत इस श्लोकमें इस प्रकार किया गया है—

(१) ‘सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य’ पदोंसे ‘मत्कर्मकृत्’ की ओर लक्ष्य है।

Verse 6 of 20 in chapter 12