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Indian PhilosophyOS

Chapter 7 · Verse 30

Bhagavad Gita 7.30

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:।

प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:॥ ३०॥

sādhibhūtādhidaivaṃ māṃ sādhiyajñaṃ ca ye viduḥ।

prayāṇakāle'pi ca māṃ te viduryuktacetasaḥ॥ 30॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

जो मनुष्य अधिभूत तथा अधिदैवके सहित और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं, वे मुझमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।

English

Sadhaka-Sanjivani

(the unmanifest Divinity), and having a steadfast mind, realize Me, even at the hour of death.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

ये
जो मनुष्य
साधि-भूताधिदैवम्
अधिभूत तथा अधिदैवके सहित
च
और
साधियज्ञम्
अधियज्ञके सहित
माम्
मुझे
विदु:
जानते हैं,
ते
वे
युक्तचेतस:
मुझमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्य
प्रयाणकाले
अन्तकालमें
अपि
भी
माम्
मुझे
च
ही
विदु:
जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~11 min read · 31 paragraphs

‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च येविदु:’—**[पूर्वश्लोकमें निर्गुण-निराकारको जाननेका वर्णन करके अब सगुण-साकारको जाननेकी बात कहते हैं।] यहाँ ‘अधिभूत’ नाम भौतिक स्थूल सृष्टिका है, जिसमें तमोगुणकी प्रधानता है। जितनी भी भौतिक सृष्टि है, उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। उसका क्षणमात्र भी स्थायित्व नहीं है। फिर भी यह भौतिक सृष्टि सत्य दीखती है अर्थात् इसमें सत्यता, स्थिरता, सुखरूपता, श्रेष्ठता और आकर्षण दीखता है। यह सत्यता आदि सब-के-सब वास्तवमें भगवान्के ही हैं, क्षणभंगुर संसारके नहीं। तात्पर्य है कि जैसे बर्फकी सत्ता जलके बिना नहीं हो सकती, ऐसे ही भौतिक स्थूल सृष्टि अर्थात् अधिभूतकी सत्ता भगवान्के बिना नहीं हो सकती। इस प्रकार तत्त्वसे यह संसार भगवत्स्वरूप ही है—ऐसा जानना ही अधिभूतके सहित भगवान्को जानना है।

‘अधिदैव’ नाम सृष्टिकी रचना करनेवाले हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीका है, जिनमें रजोगुणकी प्रधानता है। भगवान् ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट होते हैं अर्थात् तत्त्वसे ब्रह्माजी भगवत्स्वरूप ही हैं—ऐसा जानना ही अधिदैवके सहित भगवान्को जानना है।

Verse 30 of 30 in chapter 7