Chapter 7 · Verse 20
Bhagavad Gita 7.20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना:
प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता:।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया॥ २०॥
kāmaistaistairhṛtajñānāḥ
prapadyante'nyadevatāḥ।
taṃ taṃ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā॥ 20॥
हिन्दी
साधक-संजीवनीउन-उन कामनाओंसे जिनका ज्ञान हरा गया है, (ऐसे मनुष्य) अपनी-अपनी प्रकृति अर्थात् स्वभावसे नियन्त्रित होकर उस-उस अर्थात् देवताओंके उन-उन नियमोंको धारण करते हुए अन्य देवताओंके शरण हो जाते हैं।१
English
Sadhaka-SanjivaniThe English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीजो भगवान्की महत्ताको समझकर भगवान्की शरण होते हैं, ऐसे भक्तोंका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक करनेके बाद अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें देवताओंके शरण होनेवाले मनुष्योंका वर्णन करते हैं।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- तै:, तै:
- उन-उन
- कामै:
- कामनाओंसे
- हृतज्ञाना:
- जिनका ज्ञान हरा गया है, (ऐसे मनुष्य)
- स्वया
- अपनी-अपनी
- प्रकृत्या
- प्रकृति अर्थात् स्वभावसे
- नियता:
- नियन्त्रित होकर
- तम् , तम्
- उस-उस अर्थात् देवताओंके उन-उन
- नियमम्
- नियमोंको
- आस्थाय
- धारण करते हुए
- अन्यदेवता:
- अन्य देवताओंके
- प्रपद्यन्ते
- शरण हो जाते हैं।१
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी‘कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना:’—उन-उन अर्थात् इस लोकके और परलोकके भोगोंकी कामनाओंसे जिनका ज्ञान ढक गया है, आच्छादित हो गया है। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये जो विवेकयुक्त मनुष्यशरीर मिला है, उस शरीरमें आकर परमात्माकी प्राप्ति न करके वे अपनी कामनाओंकी पूर्ति करनेमें ही लगे रहते हैं।
संयोगजन्य सुखकी इच्छाको कामना कहते हैं। कामना दो तरहकी होती है—यहाँके भोग भोगनेके लिये धन-संग्रहकी कामना और स्वर्गादि परलोकके भोग भोगनेके लिये पुण्य-संग्रहकी कामना।
Verse 20 of 30 in chapter 7