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Indian PhilosophyOS

Chapter 7 · Verse 1

Bhagavad Gita 7.1

मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ १॥

mayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ।

asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu॥ 1॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

हे पृथानन्दन! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ (तू) मेरे (जिस) समग्ररूपको नि:सन्देह जिस प्रकारसे जानेगा, उसको (उसी प्रकारसे) सुन।

English

Sadhaka-Sanjivani

The Blessed Lord said: Listen, O Partha (Arjuna), how, with your mind attached to Me, and taking refuge in Me and practising Yoga, you will, without any doubt, know Me fully.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

पार्थ
हे पृथानन्दन!
मयि
मुझमें
आसक्तमना:
आसक्त मनवाला,
मदाश्रय:
मेरे आश्रित होकर
योगम्
योगका
युञ्जन्
अभ्यास करता हुआ
माम्
(तू) मेरे
समग्रम्
(जिस) समग्ररूपको
असंशयम्
नि:सन्देह
यथा
जिस प्रकारसे
ज्ञास्यसि
जानेगा,
तत्
उसको (उसी प्रकारसे)
शृणु
सुन।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~10 min read · 30 paragraphs

‘मय्यासक्तमना:’—मेरेमें ही जिसका मन आसक्त हो गया है अर्थात् अधिक स्नेहके कारण जिसका मन स्वाभाविक ही मेरेमें लग गया है, चिपक गया है, उसको मेरी याद करनी नहीं पड़ती, प्रत्युत स्वाभाविक मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती ही नहीं—ऐसा तू मेरेमें मनवाला हो।

जिसका उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धका आकर्षण मिट गया है, जिसका इस लोकमें शरीरके आराम, आदर-सत्कार और नामकी बड़ाईमें तथा स्वर्गादि परलोकके भोगोंमें किंचिन्मात्र भी खिंचाव, आसक्ति या प्रियता नहीं है, प्रत्युत केवल मेरी तरफ ही खिंचाव है, ऐसे पुरुषका नाम ‘मय्यासक्तमना:’ है।

Verse 1 of 30 in chapter 7