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Indian PhilosophyOS

Chapter 17 · Verse 16

Bhagavad Gita 17.16

मन:प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह:।

भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो

मानसमुच्यते॥ १६॥

manaḥprasādaḥ saumyatvaṃ maunamātmavinigrahaḥ।

bhāvasaṃśuddhirityetattapo

mānasamucyate॥ 16॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

मनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह (और) भावोंकी भलीभाँति शुद्धि —इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

English

Sadhaka-Sanjivani

The English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

मन:प्रसाद:
मनकी प्रसन्नता,
सौम्यत्वम्
सौम्य भाव,
मौनम्
मननशीलता,
आत्मविनि-ग्रह:
मनका निग्रह (और)
भावसंशुद्धि:
भावोंकी भलीभाँति शुद्धि
इति
—इस तरह
एतत्
यह
मानसम्
मन-सम्बन्धी
तप:
तप
उच्यते
कहा जाता है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 12 paragraphs

‘मन:प्रसाद:’—मनकी प्रसन्नताको ‘मन:प्रसाद’ कहते हैं। वस्तु, व्यक्ति, देश, काल, परिस्थिति, घटना आदिके संयोगसे पैदा होनेवाली प्रसन्नता स्थायीरूपसे हरदम नहीं रह सकती; क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, वह वस्तु स्थायी रहनेवाली नहीं होती। परन्तु दुर्गुण-दुराचारोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर जो स्थायी तथा स्वाभाविक प्रसन्नता प्रकट होती है, वह हरदम रहती है और वही प्रसन्नता मन, बुद्धि आदिमें आती है, जिससे मनमें कभी अशान्ति होती ही नहीं अर्थात् मन हरदम प्रसन्न रहता है। मनमें अशान्ति, हलचल आदि कब होते हैं? जब मनुष्य धन-सम्पत्ति, स्त्री-पुत्र आदि नाशवान् चीजोंका सहारा ले लेता है। जिसका सहारा उसने ले रखा है, वे सब चीजें आने-जानेवाली हैं, स्थायी रहनेवाली नहीं हैं। अत: उनके संयोग-वियोगसे उसके मनमें हलचल आदि होती है। यदि साधक न रहनेवाली चीजोंका सहारा छोड़कर नित्य-निरन्तर रहनेवाले प्रभुका सहारा ले ले, तो फिर पदार्थ, व्यक्ति आदिके संयोग-वियोगको लेकर उसके मनमें कभी अशान्ति, हलचल नहीं होगी।

मनकी प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय

Verse 16 of 28 in chapter 17