Chapter 16 · Verse 13
Bhagavad Gita 16.13
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥ १३॥
idamadya mayā labdhamimaṃ prāpsye manoratham।
idamastīdamapi me bhaviṣyati punardhanam॥ 13॥
हिन्दी
साधक-संजीवनीइतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर लीं (और अब) इस मनोरथको प्राप्त (पूरा) कर लेंगे। इतना धन तो हमारे पास है ही, इतना (धन) फिर भी हो जायगा।
English
Sadhaka-Sanjivani(Saying) "this has been gained by me today, further that desire I shall fulfil; this wealth is already mine and that wealth, also shall be mine."
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीआसुर स्वभाववाले व्यक्ति लोभ, क्रोध और अभिमानको लेकर किस प्रकारके मनोरथ किया करते हैं, उसे क्रमश: आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- इदम्
- इतनी वस्तुएँ तो
- मया
- हमने
- अद्य
- आज
- लब्धम्
- प्राप्त कर लीं (और अब)
- इमम्
- इस
- मनोरथम्
- मनोरथको
- प्राप्स्ये
- प्राप्त (पूरा) कर लेंगे।
- इदम्
- इतना
- धनम्
- धन तो
- मे
- हमारे पास
- अस्ति
- है ही,
- इदम्
- इतना (धन)
- पुन:
- फिर
- अपि
- भी
- भविष्यति
- हो जायगा।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी‘इदमद्यमयालब्धमिमंप्राप्स्येमनोरथम्’—आसुरी प्रकृतिवाले व्यक्ति लोभके परायण होकर मनोरथ करते रहते हैं कि हमने अपने उद्योगसे, बुद्धिमानीसे, चतुराईसे, होशियारीसे, चालाकीसे इतनी वस्तुएँ तो आज प्राप्त कर लीं, इतनी और प्राप्त कर लेंगे। इतनी वस्तुएँ तो हमारे पास हैं, इतनी और वहाँसे आ जायँगी। इतना धन व्यापारसे आ जायगा। हमारा बड़ा लड़का इतना पढ़ा हुआ है; अत: इतना धन और वस्तुएँ तो उसके विवाहमें आ ही जायँगी। इतना धन टैक्सकी चोरीसे बच जायगा, इतना जमीनसे आ जायगा, इतना मकानोंके किरायेसे आ जायगा, इतना ब्याजका आ जायगा, आदि-आदि।
‘इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्’— जैसे-जैसे उनका लोभ बढ़ता जाता है, वैसे-ही-वैसे उनके मनोरथ भी बढ़ते जाते हैं। जब उनका चिन्तन बढ़ जाता है, तब वे चलते-फिरते हुए, काम-धंधा करते हुए, भोजन करते हुए, मल-मूत्रका त्याग करते हुए और यदि नित्यकर्म (पाठ-पूजा-जप आदि) करते हैं तो उसे करते हुए भी ‘धन कैसे बढ़े’ इसका चिन्तन करते रहते हैं। इतनी दूकानें, मिल, कारखाने तो हमने खोल दिये हैं, इतने और खुल जायँ। इतनी गायें-भैंसे, भेड़-बकरियाँ आदि तो हैं ही, इतनी और हो जायँ। इतनी जमीन तो हमारे पास है, पर यह बहुत थोड़ी है, किसी तरहसे और मिल जाय तो बहुत अच्छा हो जायगा। इस प्रकार धन आदि बढ़ानेके विषयमें उनके मनोरथ होते हैं।
Verse 13 of 24 in chapter 16