Chapter 14 · Verse 25(with 14.24)
Bhagavad Gita 14.25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो:।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते॥ २५॥
mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ।
sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate॥ 25॥
हिन्दी
साधक-संजीवनी · 14.24–25जो धीर मनुष्य दु:ख-सुखमें सम (तथा) अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है; जो प्रिय-अप्रियमें सम रहता है, जो अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है; जो मान-अपमानमें सम रहता है; जो मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है (और) जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।
English
Sadhaka-Sanjivani · 14.24–25He regards pain and pleasure alike, dwells in hisownself,views a clod of earth, a stone and gold alike, remains equable amidst the pleasant and the unpleasant, is firm and views blame and praise alike; he equates honour and dishonour and is the same to friends and foes, he has abandoned all activities--such a man is said to have risen above, the three modes of nature.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीइक्कीसवें श्लोकमें अर्जुनने दूसरे प्रश्नके रूपमें गुणातीत मनुष्यके आचरण पूछे थे। उसका उत्तर अब आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।
In the next two verses, the Lord answers Arjuna's second question, "What is his conduct?"
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- धीर:
- जो धीर मनुष्य
- समदु:ख-सुख:
- दु:ख-सुखमें सम (तथा)
- स्वस्थ:
- अपने स्वरूपमें स्थित रहता है;
- समलोष्टाश्म-काञ्चन:
- जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है;
- तुल्यप्रियाप्रिय:
- जो प्रिय-अप्रियमें सम रहता है,
- तुल्यनिन्दात्म-संस्तुति:
- जो अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है;
- मानापमानयो:
- जो मान-अपमानमें
- तुल्य:
- सम रहता है;
- मित्रारिपक्षयो:
- जो मित्र-शत्रुके पक्षमें
- तुल्य:
- सम रहता है (और)
- सर्वारम्भपरित्यागी
- जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है,
- स:
- वह मनुष्य
- गुणातीत:
- गुणातीत
- उच्यते
- कहा जाता है।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी‘धीर:, समदु:खसुख:’—नित्य-अनित्य, सार-असार आदिके तत्त्वको जानकर स्वत:सिद्ध स्वरूपमें स्थित होनेसे गुणातीत मनुष्य धैर्यवान् कहलाता है।
पूर्वकर्मोंके अनुसार आनेवाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका नाम सुख-दु:ख है अर्थात् प्रारब्धके अनुसार शरीर, इन्द्रियों आदिके अनुकूल परिस्थितिको ‘सुख’ कहते हैं और शरीर, इन्द्रियों आदिके प्रतिकूल परिस्थितिको ‘दु:ख’ कहते हैं। गुणातीत मनुष्य इन दोनोंमें सम रहता है। तात्पर्य है कि सुख-दु:खरूप बाह्य परिस्थितियाँ उसके कहे जानेवाले अन्त:करणमें विकार पैदा नहीं कर सकतीं, उसको सुखी-दु:खी नहीं कर सकतीं।
Verse 25 of 27 in chapter 14