Skip to content
Indian PhilosophyOS

Chapter 13 · Verse 26

Bhagavad Gita 13.26

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि

भरतर्षभ॥ २६॥

yāvatsañjāyate kiñcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam।

kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi

bharatarṣabha॥ 26॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको (तुम) क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे (उत्पन्न हुए) समझो।

English

Sadhaka-Sanjivani

Whatever being is born, moving or unmoving, O best of the Bharatas (Arjuna), know it all as emanated from the union of the field (ksetra) and knower of the field (ksetrajna),

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

पूर्वश्लोकमें कहा गया कि श्रुतिपरायण साधक भी मृत्युको तर जाते हैं, तो अब प्रश्न होता है कि जन्म-मरणके होनेमें क्या कारण है? इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

In the preceding verse, the Lord declared that those strivers who worship after hearing from others too, go beyond death. Now a question arises, what causes death? The Lord answers the question. ltIc:h"fl>WIIltd mS'€lffifCi

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

भरतर्षभ
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन!
स्थावर-जङ्गमम्
स्थावर और जंगम
यावत्, किञ्चित्
जितने भी
सत्त्वम्
प्राणी
सञ्जायते
पैदा होते हैं,
तत्
उनको (तुम)
क्षेत्रक्षेत्रज्ञ-संयोगात्
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे (उत्पन्न हुए)
विद्धि
समझो।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~1 min read · 3 paragraphs

‘यावत्संजायते....क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्’— स्थिर रहनेवाले वृक्ष, लता, दूब, गुल्म, त्वक्सार, बेंत, बाँस, पहाड़ आदि जितने भी स्थावर प्राणी हैं और चलने-फिरनेवाले मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, मछली, कछुआ आदि जितने भी जंगम (थलचर, जलचर, नभचर) प्राणी हैं, वे सब-के-सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही पैदा होते हैं।

उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थ ‘क्षेत्र’ हैं और जो इस क्षेत्रको जाननेवाला, उत्पत्ति-विनाशरहित एवं सदा एकरस रहनेवाला है, वह ‘क्षेत्रज्ञ’ है। उस क्षेत्रज्ञ-(प्रकृतिस्थ पुरुष-)का जो शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध मानना है—यही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संयोग है। इस माने हुए संयोगके कारण ही इस जीवको स्थावर-जंगम योनियोंमें जन्म लेना पड़ता है। इसी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके संयोगको पहले इक्कीसवें श्लोकमें ‘गुणसंग:’ पदसे कहा है। तात्पर्य यह हुआ कि निरन्तर परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ तादात्म्य कर लेनेसे स्वयं जीवात्मा भी अपनेको जन्मने-मरनेवाला मान लेता है।

Verse 26 of 34 in chapter 13