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Indian PhilosophyOS

Chapter 13 · Verse 20(with 13.19)

Bhagavad Gita 13.20

कार्यकरणकर्तृत्वे

हेतु:

प्रकृतिरुच्यते।

पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥ २०॥

kāryakaraṇakartṛtve

hetuḥ

prakṛtirucyate।

puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate॥ 20॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी · 13.19–20

प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही (तुम) अनादि समझो और विकारोंको तथा गुणोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न समझो। कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें प्रकृति हेतु कही जाती है (और) सुख-दु:खोंके भोक्तापनमें पुरुष हेतु कहा जाता है।

English

Sadhaka-Sanjivani · 13.19–20

The English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

इसी अध्यायके पहले और दूसरे श्लोकमें जिस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका संक्षेपसे वर्णन किया था, उसीका विस्तारसे वर्णन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

प्रकृतिम्
प्रकृति
च
और
पुरुषम्
पुरुष
उभौ
दोनोंको
एव
ही (तुम)
अनादी
अनादि
विद्धि
समझो
च
और
विकारान्
विकारोंको
च
तथा
गुणान्
गुणोंको
अपि
भी
प्रकृतिसम्भवान्, एव
प्रकृतिसे ही उत्पन्न
विद्धि
समझो।
कार्यकरणकर्तृत्वे
कार्य और करणके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको उत्पन्न करनेमें
प्रकृति:
प्रकृति
हेतु:
हेतु
उच्यते
कही जाती है (और)
सुखदु:खानाम्
सुख-दु:खोंके
भोक्तृत्वे
भोक्तापनमें
पुरुष:
पुरुष
हेतु:
हेतु
उच्यते
कहा जाता है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~8 min read · 19 paragraphs

[इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें ‘यच्च’ (जो है), ‘यादृक् च’ (जैसा है), ‘यद्विकारि’ (जिन विकारोंवाला है) और ‘यतश्च यत्’ (जिससे जो उत्पन्न हुआ है)—ये चार बातें सुननेकी आज्ञा दी थी। उनमेंसे ‘यच्च’ का वर्णन पाँचवें श्लोकमें और ‘यद्विकारि’ का वर्णन छठे श्लोकमें कर दिया। ‘यादृक्च’ का वर्णन आगे इसी अध्यायके छब्बीसवें-सत्ताईसवें श्लोकोंमें करेंगे। अब ‘यतश्च यत्’ का वर्णन करते हुए प्रकृतिसे विकारों और गुणोंको उत्पन्न हुआ बताते हैं। इसमें भी देखा जाय तो विकारोंका वर्णन पहले छठे श्लोकमें ‘इच्छा द्वेष:’ आदि पदोंसे किया जा चुका है। यहाँ गुण प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं—यह बात नयी बतायी है।

बारहवेंसे अठारहवें श्लोकतक ‘ज्ञेय तत्त्व’-(परमात्मा-) का वर्णन है और यहाँ उन्नीसवेंसे चौंतीसवें श्लोकतक ‘पुरुष’-(क्षेत्रज्ञ-) का वर्णन है। वहाँ तो ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत ही सब कुछ है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत सब कुछ है अर्थात् वहाँ ज्ञेय तत्त्वके अन्तर्गत पुरुष है और यहाँ पुरुषके अन्तर्गत ज्ञेय तत्त्व है। तात्पर्य यह है कि ज्ञेय तत्त्व (परमात्मा) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ)—दोनों तत्त्वसे दो नहीं हैं, प्रत्युत एक ही हैं।]

Verse 20 of 34 in chapter 13