Chapter 9 · Verse 18(with 9.16, 9.17)
Bhagavad Gita 9.18
गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत्।
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥ १८॥
gatirbhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṃ suhṛt।
prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṃ nidhānaṃ bījamavyayam॥ 18॥
हिन्दी
साधक-संजीवनी · 9.16–18क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ (और) हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान (भण्डार) (तथा) अविनाशी बीज (भी मैं ही हूँ)।
English
Sadhaka-Sanjivani · 9.16–18Yajus. I am the father, sustainer, mother, grandfather, goal, supporter, Lord, witness, abode, refuge, disinterested friend, origin, end, resting place, storehouse and the imperishable seed, of this universe.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीजब सभी उपासनाएँ अलग-अलग हैं, तो फिर सभी उपासनाएँ आपकी कैसे हुईं? इसपर आगेके चार श्लोक कहते हैं।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- क्रतु:
- क्रतु
- अहम्
- मैं हूँ,
- यज्ञ:
- यज्ञ
- अहम्
- मैं हूँ,
- स्वधा
- स्वधा
- अहम्
- मैं हूँ,
- औषधम्
- औषध
- अहम्
- मैं हूँ,
- मन्त्र:
- मन्त्र
- अहम्
- मैं हूँ,
- आज्यम्
- घृत
- अहम्
- मैं हूँ,
- अग्नि:
- अग्नि
- अहम्
- मैं हूँ (और)
- हुतम्
- हवनरूप क्रिया
- एव
- भी
- अहम्
- मैं हूँ।
- वेद्यम्
- जाननेयोग्य
- पवित्रम्
- पवित्र
- ओङ्कार:
- ओंकार,
- ऋक्
- ऋग्वेद,
- साम
- सामवेद
- च
- और
- यजु:
- यजुर्वेद
- एव
- भी
- अहम्
- मैं ही हूँ।
- अस्य
- इस
- जगत:
- सम्पूर्ण जगत्का
- पिता
- पिता,
- धाता
- धाता,
- माता
- माता,
- पितामह:
- पितामह,
- गति:
- गति,
- भर्ता
- भर्ता,
- प्रभु:
- प्रभु,
- साक्षी
- साक्षी,
- निवास:
- निवास,
- शरणम्
- आश्रय,
- सुहृत्
- सुहृद्,
- प्रभव:
- उत्पत्ति,
- प्रलय:
- प्रलय,
- स्थानम्
- स्थान,
- निधानम्
- निधान (भण्डार)
- अव्ययम्
- (तथा) अविनाशी
- बीजम्
- बीज (भी मैं ही हूँ)।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी[सातवें अध्यायसे बारहवें अध्यायतकके इस मध्यम षट्कमें भगवान्ने अपनी भक्तिका (उपासनाका) वर्णन किया है और उसमें ‘अस्मत्’ अर्थात् ‘अहम्’,‘मम’, ‘मया’, ‘मत्’ आदि शब्दोंका प्रयोग किया है। यहाँ सोलहवें श्लोकमें तो ‘अस्मत्’ अर्थात् ‘अहम्’ शब्दका प्रयोग आठ बार किया गया है। ‘अहम्’ शब्दका इतना अधिक प्रयोग इस षट्कके दूसरे किसी भी श्लोकमें नहीं किया गया है।
अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वासके अनुसार किसीको भी साक्षात् परमात्माका स्वरूप मानकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ा जाय तो वास्तवमें यह सम्बन्ध सत्के साथ ही है। केवल अपने मन-बुद्धिमें किंचिन्मात्र भी संदेह न हो। जैसे ज्ञानके द्वारा मनुष्य सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें एक परमात्मतत्त्वको ही जानता है। परमात्माके सिवाय दूसरी किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया आदिकी किंचिन्मात्र भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—इसमें उसको किंचिन्मात्र भी संदेह नहीं होता। ऐसे ही भगवान् विराट्रूपसे अनेक रूपोंमें प्रकट हो रहे हैं; अत: सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं—इसमें अपनेको किंचिन्मात्र भी संदेह नहीं होना चाहिये। कारण कि ‘यह सब भगवान् कैसे हो सकते हैं?’ यह संदेह साधकको वास्तविक तत्त्वसे, मुक्तिसे वंचित कर देता है और महान् आफतमें फँसा देता है। अत: यह बात दृढ़तासे मान लें कि कार्य-कारणरूपसे स्थूल-सूक्ष्मरूप जो कुछ देखने, सुनने, समझने और माननेमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। इसी कार्य-कारणरूपसे भगवान्की सर्वव्यापकताका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक किया गया है।] ‘अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्’—जो वैदिक रीतिसे किया जाय, वह ‘क्रतु’ होता है। वह क्रतु मैं ही हूँ। जो स्मार्त (पौराणिक) रीतिसे किया जाय, वह ‘यज्ञ’ होता है, जिसको पंचमहायज्ञ आदि स्मार्त-कर्म कहते हैं। वह यज्ञ मैं हूँ। पितरोंके लिये जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसको स्वधा कहते हैं। वह स्वधा मैं ही हूँ। उन क्रतु, यज्ञ और स्वधाके लिये आवश्यक जो शाकल्य है अर्थात् वनस्पतियाँ हैं, बूटियाँ हैं, तिल, जौ, छुहारा आदि औषध है, वह औषध भी मैं ही हूँ।
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