Chapter 6 · Verse 33
Bhagavad Gita 6.33
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥ ३३॥
yo'yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana।
etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvātsthitiṃ sthirām॥ 33॥
हिन्दी
साधक-संजीवनीहे मधुसूदन! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, (मनकी) चंचलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हँू।
English
Sadhaka-SanjivaniO Krsna, this Yoga of equanimity has been preached by You but I do not perceive its stability, due to restlessness of mind.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीजिस समताकी प्राप्ति सांख्ययोग और कर्मयोगके द्वारा होती है, उसी समताकी प्राप्ति ध्यानयोगके द्वारा भी होती है—इसको भगवान्ने दसवें श्लोकसे उनतीसवें श्लोकतक बताया। अब अर्जुन ध्यानयोगसे प्राप्त समताको लेकर आगेके दो श्लोकोंमें अपनी मान्यता प्रकट करते हैं।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- मधुसूदन
- हे मधुसूदन!
- त्वया
- आपने
- साम्येन
- समतापूर्वक
- य:
- जो
- अयम्
- यह
- योग:
- योग
- प्रोक्त:
- कहा है,
- चञ्चलत्वात्
- (मनकी) चंचलताके कारण
- अहम्
- मैं
- एतस्य
- इस योगकी
- स्थिराम्
- स्थिर
- स्थितिम्
- स्थिति
- न
- नहीं
- पश्यामि
- देखता हँू।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी[मनुष्यके कल्याणके लिये भगवान्ने गीतामें खास बात बतायी कि सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिको लेकर चित्तमें समता रहनी चाहिये। इस समतासे मनुष्यका कल्याण होता है। अर्जुन पापोंसे डरते थे तो उनके लिये भगवान्ने कहा कि ‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:खको समान समझकर तुम युद्ध करो, फिर तुम्हारेको पाप नहीं लगेगा’ (गीता—दूसरे अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। जैसे दुनियामें बहुत-से पाप होते रहते हैं, पर वे पाप हमें नहीं लगते; क्योंकि उन पापोंमें हमारी विषम-बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत समबुद्धि रहती है। ऐसे ही समबुद्धिपूर्वक सांसारिक काम करनेसे कर्मोंसे बन्धन नहीं होता। इसी भावसे भगवान्ने इस अध्यायके आरम्भमें कहा है कि जो कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है। इसी कर्मफल-त्यागकी सिद्धि भगवान्ने ‘समता’ बतायी (छठे अध्यायका नवाँ श्लोक)। इस समताकी प्राप्तिके लिये भगवान्ने दसवें श्लोकसे बत्तीसवें श्लोकतक ध्यानयोगका वर्णन किया। इसी ध्यानयोगके वर्णनका लक्ष्य करके अर्जुन यहाँ अपनी मान्यता प्रकट करते हैं।]
‘योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन’—यहाँ अर्जुनने जो अपनी मान्यता बतायी है, वह पूर्वश्लोकको लेकर नहीं है, प्रत्युत ध्यानके साधनको लेकर है। कारण कि बत्तीसवाँ श्लोक ध्यानयोगद्वारा सिद्ध पुरुषका है और सिद्ध पुरुषकी समता स्वत: होती है। इसलिये यहाँ ‘य:’ पदसे इस प्रकरणसे पहले कहे हुए योग-(समता-) का संकेत है और ‘अयम्’ पदसे दसवें श्लोकसे अट्ठाईसवें श्लोकतक कहे हुए ध्यानयोगके साधनका संकेत है। ‘एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम्’- इन पदोंसे अर्जुनका यह आशय मालूम देता है कि कर्मयोगसे तो समताकी प्राप्ति सुगम है, पर यहाँ जिस ध्यानयोगसे समताकी प्राप्ति बतायी है, मनकी चंचलताके कारण उस ध्यानमें स्थिर स्थिति रहना मुझे बड़ा कठिन दिखायी देता है। तात्पर्य है कि जबतक मनकी चंचलताका नाश नहीं होगा, तबतक ध्यानयोग सिद्ध नहीं होगा और ध्यानयोग सिद्ध हुए बिना समताकी प्राप्ति नहीं होगी।
Verse 33 of 47 in chapter 6