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Indian PhilosophyOS

Chapter 6 · Verse 29

Bhagavad Gita 6.29

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:॥ २९॥

sarvabhūtasthamātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani।

īkṣate yogayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ॥ 29॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

सब जगह अपने स्वरूपको देखनेवाला और ध्यानयोगसे युक्त अन्त:करणवाला (सांख्ययोगी) अपने स्वरूपको सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित देखता है (और) सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने स्वरूपमें (देखता है)।

English

Sadhaka-Sanjivani

The Yogi, whosemind is steeped in Yoga, looks on all with an equal eye, sees his self present, in all beings and all beings mere as appearance within his self.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

अठारहवेंसे तेईसवें श्लोकतक स्वरूपका ध्यान करनेवाले जिस सांख्ययोगीका वर्णन हुआ है, उसके अनुभवका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

Now, in the next verse, Lord

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

सर्वत्र
सब जगह
समदर्शन:
अपने स्वरूपको देखनेवाला
च
और
योगयुक्तात्मा
ध्यानयोगसे युक्त अन्त:करणवाला (सांख्ययोगी)
आत्मानम्
अपने स्वरूपको
सर्वभूतस्थम्
सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित
ईक्षते
देखता है (और)
सर्वभूतानि
सम्पूर्ण प्राणियोंको
आत्मनि
अपने स्वरूपमें (देखता है)।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 6 paragraphs

‘ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:’— सब जगह एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। जैसे मनुष्य खाँड़से बने हुए अनेक तरहके खिलौनोंके नाम, रूप, आकृति आदि भिन्न-भिन्न होनेपर भी उनमें समानरूपसे एक खाँड़को, लोहेसे बने हुए अनेक तरहके अस्त्र-शस्त्रोंमें एक लोहेको, मिट्टीसे बने हुए अनेक तरहके बर्तनोंमें एक मिट्टीको और सोनेसे बने हुए आभूषणोंमें एक सोनेको ही देखता है, ऐसे ही ध्यानयोगी तरह-तरहकी वस्तु, व्यक्ति आदिमें समरूपसे एक अपने स्वरूपको ही देखता है। ‘योगयुक्तात्मा’—इसका तात्पर्य है कि ध्यानयोगका अभ्यास करते-करते उस योगीका अन्त:करण अपने स्वरूपमें तल्लीन हो गया है। [तल्लीन होनेके बाद उसका अन्त:करणसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, जिसका संकेत ‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि’ पदोंसे किया गया है।]

‘सर्वभूतस्थमात्मानम्’—वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपनी आत्माको—अपने सत्स्वरूपको स्थित देखता है। जैसे साधारण प्राणी सारे शरीरमें अपने-आपको देखता है अर्थात् शरीरके सभी अवयवोंमें, अंशोंमें ‘मैं’ को ही पूर्णरूपसे देखता है, ऐसे ही समदर्शी पुरुष सब प्राणियोंमें अपने स्वरूपको ही स्थित देखता है।

Verse 29 of 47 in chapter 6