Skip to content
Indian PhilosophyOS

Chapter 5 · Verse 26

Bhagavad Gita 5.26

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।

अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥ २६॥

kāmakrodhaviyuktānāṃ yatīnāṃ yatacetasām।

abhito brahmanirvāṇaṃ vartate viditātmanām॥ 26॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

काम-क्रोधसे सर्वथा रहित, जीते हुए मनवाले (और) स्वरूपका किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये सब ओरसे (शरीरके रहते शरीर छूटनेके बाद) निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है।

English

Sadhaka-Sanjivani

To those wise,who are freed from desire and anger, who have subdued their minds and who have realized the self for them the beatitude of God (Brahmic bliss) pervades on all sides.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें भगवान्ने सांख्ययोगके साधकोंद्वारा निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त करनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें यह बताते हैं कि निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर उसका कैसा अनुभव होता है?

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

वियुक्तानाम्
काम-क्रोधसे सर्वथा रहित,
यतचेतसाम्
जीते हुए मनवाले (और)
विदितात्मनाम्
स्वरूपका किये हुए
यतीनाम्
सांख्ययोगियोंके लिये
अभित:
सब ओरसे (शरीरके रहते शरीर छूटनेके बाद)
ब्रह्मनिर्वाणम्
निर्वाण ब्रह्म
वर्तते
परिपूर्ण है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 7 paragraphs

‘कामक्रोधवियुक्तानां यतीनाम्’— भगवान् उपर्युक्त पदोंसे यह स्पष्ट कह रहे हैं कि सिद्ध महापुरुषमें काम-क्रोधादि दोषोंकी गन्ध भी नहीं रहती। काम-क्रोधादि दोष उत्पत्ति-विनाशशील असत् पदार्थों (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि) के सम्बन्धसे उत्पन्न होते हैं। सिद्ध महापुरुषको उत्पत्ति-विनाशरहित सत्-तत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है, अत: उत्पत्ति-विनाशशील असत् पदार्थोंसे उसका सम्बन्ध सर्वथा नहीं रहता। उसके अनुभवमें अपने कहलानेवाले शरीर— अन्त:करणसहित सम्पूर्ण संसारके साथ अपने सम्बन्धका सर्वथा अभाव हो जाता है; अत: उसमें काम-क्रोध आदि विकार कैसे उत्पन्न हो सकते हैं? यदि काम-क्रोध सूक्ष्मरूपसे भी हों, तो अपनेको जीवन्मुक्त मान लेना भ्रम ही है।

उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंकी इच्छाको ‘काम’ कहते हैं। काम अर्थात् कामना अभावमें पैदा होती है। अभाव सदैव असत्में रहता है। सत्-स्वरूपमें अभाव है ही नहीं। परन्तु जब स्वरूप असत्से तादात्म्य कर लेता है, तब असत्-अंशके अभावको वह अपनेमें मान लेता है। अपनेमें अभाव माननेसे ही कामना पैदा होती है और कामना-पूर्तिमें बाधा लगनेपर क्रोध आ जाता है। इस प्रकार स्वरूपमें कामना न होनेपर भी तादात्म्यके कारण अपनेमें कामनाकी प्रतीति होती है। परन्तु जिनका तादात्म्य नष्ट हो गया है और स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो गया है, उन्हें स्वयंमें असत्के अभावका अनुभव हो ही कैसे सकता है?

Verse 26 of 29 in chapter 5