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Indian PhilosophyOS

Chapter 5 · Verse 25

Bhagavad Gita 5.25

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।

छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:॥ २५॥

labhante brahmanirvāṇamṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ।

chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahite ratāḥ॥ 25॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो गये हैं, (वे) विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।

English

Sadhaka-Sanjivani

Those holy men whose sins are destroyed, whose doubts (dualities) are annihilated, whose minds are disciplined and who are devoted to the welfare of all beings, attain the beatitude of God.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

पूर्वश्लोकमें भगवान्ने निवृत्तिपूर्वक सांख्ययोगकी साधना बतायी। अब आगेके श्लोकमें प्रवृत्तिपूर्वक सांख्ययोगकी साधना बताते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

यतात्मान:
जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है,
सर्वभूतहिते
जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें
रता:
रत हैं,
छिन्नद्वैधा:
जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं,
क्षीणकल्मषा:
जिनके सम्पूर्ण दोष नष्ट हो गये हैं,
ऋषय:
(वे) विवेकी साधक
ब्रह्मनिर्वाणम्
निर्वाण ब्रह्मको
लभन्ते
प्राप्त होते हैं।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 6 paragraphs

‘यतात्मान:’—नित्य सत्यतत्त्वकी प्राप्तिका दृढ़ लक्ष्य होनेके कारण साधकोंको शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि वशमें करने नहीं पड़ते, प्रत्युत ये स्वाभाविक ही सुगमतापूर्वक उनके वशमें हो जाते हैं। वशमें होनेके कारण इनमें राग-द्वेषादि दोषोंका अभाव हो जाता है और इनके द्वारा होनेवाली प्रत्येक क्रिया दूसरोंका हित करनेवाली हो जाती है।

शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको अपने और अपने लिये मानते रहनेसे ही ये अपने वशमें नहीं होते और इनमें राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि दोष विद्यमान रहते हैं। ये दोष जबतक विद्यमान रहते हैं, तबतक साधक स्वयं इनके वशमें रहता है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह शरीरादिको कभी अपना और अपने लिये न माने। ऐसा माननेसे इनकी आग्रहकारिता समाप्त हो जाती है और ये वशमें हो जाते हैं। अत: जिनका शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें अपनेपनका भाव नहीं है तथा जो इन शरीरादिको कभी अपना स्वरूप नहीं मानते, ऐसे सावधान साधकोंके लिये यहाँ ‘यतात्मान:’ पद आया है।

Verse 25 of 29 in chapter 5