Chapter 4 · Verse 13(with 4.14)
Bhagavad Gita 4.13
चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ १३॥
cāturvaṇryaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ।
tasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam॥ 13॥
हिन्दी
साधक-संजीवनी · 4.13–14मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभाग-पूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस (सृष्टि-रचना आदि)-का कर्ता होनेपर भी मुझ अविनाशी परमेश्वरको (तू) अकर्ता जान! (कारण कि) कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, (इसलिये) मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह (भी) कर्मोंसे नहीं बँधता।
English
Sadhaka-Sanjivani · 4.13–14.The fourfold order was created by Me according to the modes oftheir nature and action (Karma). Though, I am the creator, know Me, the immortal Lord, to be a non-doer. Since I have no craving for the fruit of actions, these do,not taint Me. He who knows Me thus, (in reality) is not affected by actions.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीआठवें श्लोकमें अपने अवतारके उद्देश्यका वर्णन करके नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको जाननेका माहात्म्य बताया। कर्मजन्य सिद्धि चाहनेसे ही कर्मोंमें अदिव्यता (मलिनता) आती है। अत: कर्मोंमें दिव्यता (पवित्रता) कैसे आती है—इसे बतानेके लिये अब भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका विशेष वर्णन करते हैं।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- मया
- मेरे द्वारा
- गुणकर्मविभागश:
- गुणों और कर्मोंके विभाग-पूर्वक
- चातुर्वण्र्यम्
- चारों वर्णोंकी
- सृष्टम्
- रचना की गयी है।
- तस्य
- उस (सृष्टि-रचना आदि)-का
- कर्तारम्
- कर्ता होनेपर
- अपि
- भी
- माम्
- मुझ
- अव्ययम्
- अविनाशी परमेश्वरको (तू)
- अकर्तारम्
- अकर्ता
- विद्धि
- जान! (कारण कि)
- कर्मफले
- कर्मोंके फलमें
- मे
- मेरी
- स्पृहा
- स्पृहा
- न
- नहीं है, (इसलिये)
- माम्
- मुझे
- कर्माणि
- कर्म
- न, लिम्पन्ति
- लिप्त नहीं करते।
- इति
- इस प्रकार
- य:
- जो
- माम्
- मुझे
- अभिजानाति
- तत्त्वसे जान लेता है,
- स:
- वह (भी)
- कर्मभि:
- कर्मोंसे
- न
- नहीं
- बध्यते
- बँधता।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी‘चातुर्वण्र्यं * मया सृष्टं गुणकर्म-विभागश:’—पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके अनुसार सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंमें न्यूनाधिकता रहती है। सृष्टि-रचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार
गया है। भगवान् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं*। मनुष्यके सिवाय देव, पितर, तिर्यक् आदि दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान् गुणों और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसमें भगवान्की किंचिन्मात्र भी विषमता नहीं है।
Verse 13 of 42 in chapter 4