Chapter 3 · Verse 24(with 3.23)
Bhagavad Gita 3.24
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा:॥ २४॥
utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham।
saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ॥ 24॥
हिन्दी
साधक-संजीवनी · 3.23–24क्योंकि हे पार्थ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे (ही) मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ (तो) ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और (मैं) वर्णसंकरताको करनेवाला होऊँ (तथा) इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।
English
Sadhaka-Sanjivani · 3.23–24For, if I did not engage Myself in action without care, men would in everyway follow My path, O Arjuna. If I did not perform action, these worlds would perish.and I would prove to be the creator of confusion and for the destruction of these people.
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- हि
- क्योंकि
- पार्थ
- हे पार्थ!
- यदि
- अगर
- अहम्
- मैं
- जातु
- किसी समय
- अतन्द्रित:
- सावधान होकर
- कर्मणि
- कर्तव्यकर्म
- न
- न
- वर्तेयम्
- करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि)
- मनुष्या:
- मनुष्य
- सर्वश:
- सब प्रकारसे
- मम
- मेरे (ही)
- वत्र्म
- मार्गका
- अनुवर्तन्ते
- अनुसरण करते हैं।
- चेत्
- यदि
- अहम्
- मैं
- कर्म
- कर्म
- न
- न
- कुर्याम्
- करूँ (तो)
- इमे
- ये
- लोका:
- सब मनुष्य
- उत्सीदेयु:
- नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ
- च
- और (मैं)
- सङ्करस्य
- वर्णसंकरताको
- कर्ता
- करनेवाला
- स्याम्
- होऊँ (तथा)
- इमा:
- इस
- प्रजा:
- समस्त प्रजाको
- उपहन्याम्
- नष्ट करनेवाला बनूँ।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी[बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने अन्वय-रीतिसे कर्तव्य-पालनकी आवश्यकताका प्रतिपादन किया और इन श्लोकोंमें भगवान् व्यतिरेक-रीतिसे कर्तव्य-पालन न करनेसे होनेवाली हानिका प्रतिपादन करते हैं।]
‘यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित:’— पूर्वश्लोकमें आये ‘वर्त एव च कर्मणि’ पदोंकी पुष्टिके लिये यहाँ ‘हि’ पद आया है।
Verse 24 of 43 in chapter 3