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Indian PhilosophyOS

Chapter 3 · Verse 2(with 3.1)

Bhagavad Gita 3.2

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥ २॥

vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṃ mohayasīva me।

tadekaṃ vada niścitya yena śreyo'hamāpnuyām॥ 2॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी · 3.1–2

हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि (ज्ञान) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? (आप अपने) मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। निश्चय करके उस एक बातको कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ।

English

Sadhaka-Sanjivani · 3.1–2

The English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

जनार्दन
हे जनार्दन!
चेत्
अगर
ते
आप
कर्मण:
कर्मसे
बुद्धि:
बुद्धि (ज्ञान) को
ज्यायसी
श्रेष्ठ
मता
मानते हैं,
तत्
तो फिर
केशव
हे केशव!
माम्
मुझे
घोरे
घोर
कर्मणि
कर्ममें
किम्
क्यों
नियोजयसि
लगाते हैं?
व्यामिश्रेण,इव
(आप अपने) मिले हुए-से
वाक्येन
वचनोंसे
मे
मेरी
बुद्धिम्
बुद्धिको
मोहयसि, इव
मोहित-सी कर रहे हैं।
निश्चित्य
निश्चय करके
तत्
उस
एकम्
एक बातको
वद
कहिये,
येन
जिससे
अहम्
मैं
श्रेय:
कल्याणको
आप्नुयाम्
प्राप्त हो जाऊँ।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~4 min read · 8 paragraphs

‘जनार्दन’—इस पदसे अर्जुन मानो यह भाव प्रकट करते हैं कि हे श्रीकृष्ण! आप सभीकी याचना पूरी करनेवाले हैं; अत: मेरी याचना तो अवश्य ही पूरी करेंगे।

‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ............. नियोजयसि केशव’— मनुष्यके अन्त:करणमें एक कमजोरी रहती है कि वह प्रश्न करके उत्तरके रूपमें भी वक्तासे अपनी बात अथवा सिद्धान्तका ही समर्थन चाहता है। इसे कमजोरी इसलिये कहा गया है कि वक्ताके निर्देशका चाहे वह मनोऽनुकूल हो या सर्वथा प्रतिकूल, पालन करनेका निश्चय ही शूरवीरता है, शेष सब कमजोरी या कायरता ही कही जायगी। इस कमजोरीके कारण ही मनुष्यको प्रतिकूलता सहनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। जब वह प्रतिकूलताको सह नहीं सकता, तब वह अच्छाईका चोला पहन लेता है अर्थात् तब भलाईके वेशमें बुराई आती है। जो बुराई भलाईके वेशमें आती है, उसका त्याग करना बड़ा कठिन होता है। यहाँ अर्जुनमें भी हिंसा-त्यागरूप भलाईके वेशमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। अत: वे कर्तव्य-कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मान रहे हैं। इसी कारण वे यहाँ प्रश्न करते हैं कि यदि आप कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे युद्धरूप घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?

Verse 2 of 43 in chapter 3