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Indian PhilosophyOS

Chapter 18 · Verse 70

Bhagavad Gita 18.70

अध्येष्यते च य इमं धम्र्यं संवादमावयो:।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति:॥ ७०॥

adhyeṣyate ca ya imaṃ dhamryaṃ saṃvādamāvayoḥ।

jñānayajñena tenāhamiṣṭaḥ syāmiti me matiḥ॥ 70॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा— ऐसा मेरा मत है।

English

Sadhaka-Sanjivani

And, hewhocontemplatesthis sacred dialogue ofours, he shall be worshipping Me, through the sacrifice (yajna), of knowledge (wisdom)-such is my conviction.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

जिसमें गीताका प्रचार करनेकी योग्यता नहीं है, वह क्या करे? इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

य:
जो मनुष्य
आवयो:
हम दोनोंके
इमम्
इस
धम्र्यम्
धर्ममय
संवादम्
संवादका
अध्येष्यते
अध्ययन करेगा,
तेन
उसके द्वारा
च
भी
अहम्
मैं
ज्ञानयज्ञेन
ज्ञानयज्ञसे
इष्ट:
पूजित
स्याम्
होऊँगा—
इति
ऐसा
मे
मेरा
मति:
मत है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~6 min read · 10 paragraphs

‘अध्येष्यते च य इमं धम्र्यं संवाद-मावयो:’—तुम्हारा और हमारा यह संवाद शास्त्रों, सिद्धान्तोंके साररूप धर्मसे युक्त है। यह बहुत विचित्र बात है कि परस्पर साथ रहते हुए तुम्हारे-हमारे बहुत वर्ष बीत गये; परन्तु हम दोनोंका ऐसा संवाद कभी नहीं हुआ! ऐसा धर्ममय संवाद तो कोई विलक्षण, अलौकिक अवसर आनेपर ही होता है।

जबतक मनुष्यकी संसारसे उकताहट न हो, वैराग्य या उपरति न हो और हृदयमें जोरदार हलचल न मची हो, तबतक उसकी असली जिज्ञासा जाग्रत् नहीं होती। किसी कारणवश जब यह मनुष्य अपने कर्तव्यका निर्णय करनेके लिये व्याकुल हो जाता है, जब अपने कल्याणके लिये कोई रास्ता नहीं दीखता, बिना समाधानके और कोई सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि किंचिन्मात्र भी अच्छी नहीं लगती, एकमात्र हृदयका सन्देह दूर करनेकी धुन (चटपटी) लग जाती है, एक ही जोरदार जिज्ञासा होती है और दूसरी तरफसे मन सर्वथा हट जाता है, तब यह मनुष्य जहाँसे प्रकाश और समाधान मिलनेकी सम्भावना होती है, वहाँ अपना हृदय खोलकर बात पूछता है, प्रार्थना करता है, शरण हो जाता है, शिष्य हो जाता है।

Verse 70 of 78 in chapter 18