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Indian PhilosophyOS

Chapter 18 · Verse 58

Bhagavad Gita 18.58

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ ५८॥

maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi।

atha cettvamahaṅkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasi॥ 58॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

मुझमें चित्तवाला होकर (तू) मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा और यदि तू अहंकारके कारण (मेरी बात) नहीं सुनेगा (तो) तेरा पतन हो जायगा।

English

Sadhaka-Sanjivani

Fixing thy mind on Me, thou shalt' by My grace, overcome all obstacles; but if, from egoism, thou wilt not listen to Me, thou shalt perish.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

पूर्वश्लोकमें दी हुई आज्ञाको अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें क्रमश: अन्वय और व्यतिरेक-रीतिसे दृढ़ करते हैं।

The Lord, in the next two verses, points out toArjuna the reward ofobeying His command, and the harm which would befall him, if he did not obey Him.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

मच्चित्त:
मुझमें चित्तवाला होकर (तू)
मत्प्रसादात्
मेरी कृपासे
सर्वदुर्गाणि
सम्पूर्ण विघ्नोंको
तरिष्यसि
तर जायगा
अथ
और
चेत्
यदि
त्वम्
तू
अहङ्कारात्
अहंकारके कारण (मेरी बात)
न
नहीं
श्रोष्यसि
सुनेगा (तो)
विनङ्क्ष्यसि
तेरा पतन हो जायगा।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~7 min read · 16 paragraphs

‘मच्चित्त:सर्वदुर्गाणिमत्प्रसादा-त्तरिष्यसि’—भगवान् कहते हैं कि मेरेमें चित्तवाला होनेसे तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न, बाधा, शोक, दु:ख आदिको तर जायगा अर्थात् उनको दूर करनेके लिये तुझे कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा।

भगवद्भक्तने अपनी तरफसे सब कर्म भगवान्के अर्पण कर दिये, स्वयं भगवान्के अर्पित हो गया, समताके आश्रयसे संसारकी संयोगजन्य लोलुपतासे सर्वथा विमुख हो गया और भगवान्के साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया। यह सब कुछ हो जानेपर भी वास्तविक तत्त्वकी प्राप्तिमें यदि कुछ कमी रह जाय या सांसारिक लोगोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता देखकर अभिमान आ जाय अथवा इस प्रकारके कोई सूक्ष्म दोष रह जायँ, तो उन दोषोंको दूर करनेकी साधकपर कोई जिम्मेवारी नहीं रहती, प्रत्युत उन दोषोंको, विघ्न-बाधाओंको दूर करनेकी पूरी जिम्मेवारी भगवान्की हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं— ‘मत्प्रसादात्तरिष्यसि’ अर्थात् मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको तर जायगा। इसका तात्पर्य यह निकला कि भक्त अपनी तरफसे, उसको जितना समझमें आ जाय, उतना पूरी सावधानीके साथ कर ले, उसके बाद जो कुछ कमी रह जायगी, वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।

Verse 58 of 78 in chapter 18