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Indian PhilosophyOS

Chapter 18 · Verse 56

Bhagavad Gita 18.56

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय:।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ ५६॥

sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ।

matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayam॥ 56॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है।

English

Sadhaka-Sanjivani

continually all actions whatsoever, taking refuge in Me, by My grace, My devotee, attains the Eternal imperishable State.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया; और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उनचासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यान-प्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

मद्व्यपाश्रय:
मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त
सदा
सदा
सर्वकर्माणि
सब कर्म
कुर्वाण:
करता हुआ
अपि
भी
मत्प्रसादात्
मेरी कृपासे
शाश्वतम्
शाश्वत
अव्ययम्
अविनाशी
पदम्
पदको
अवाप्नोति
प्राप्त हो जाता है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 5 paragraphs

‘मद्व्यपाश्रय:’—कर्मोंका, कर्मोंके फलका, कर्मोंके पूरा होने अथवा न होनेका, किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है, अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता, किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता, सर्वथा मेरे आश्रित रहता है, ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक); उसको अपने जीवन-निर्वाह या साधन-सम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती; सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)—यह मेरा सदाका एक विधान है, नियम है, जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)।

‘सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाण:’—यहाँ ‘कर्माणि’ पदके साथ ‘सर्व’ और ‘कुर्वाण:’ पदके साथ ‘सदा’ पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर, वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है, उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है, उसी पदको लौकिक, पारलौकिक, सामाजिक, शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है।

Verse 56 of 78 in chapter 18