Chapter 18 · Verse 20
Bhagavad Gita 18.20
सर्वभूतेषु
येनैकं
भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ २०॥
sarvabhūteṣu
yenaikaṃ
bhāvamavyayamīkṣate।
avibhaktaṃ vibhakteṣu tajjñānaṃ viddhi sāttvikam॥ 20॥
हिन्दी
साधक-संजीवनीजिस ज्ञानके द्वारा (साधक) सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव (सत्ता) को देखता है, उस ज्ञानको (तुम) सात्त्विक समझो।
English
Sadhaka-SanjivaniThe knowledge, by which one realises the Imperishable Being (Reality) in different beings, as undivided (not separate in separate beings), knows such knowledge to be sattvika,
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीअब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं। **‘अपि’—**इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है; क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर **‘यस्य नाहंकृतो भावो......न हन्ति न निबध्यते’** (१८। १७)— इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- येन
- जिस ज्ञानके द्वारा (साधक)
- विभक्तेषु , सर्वभूतेषु
- सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें
- अविभक्तम्
- विभागरहित
- एकम्
- एक
- अव्ययम्
- अविनाशी
- भावम्
- भाव (सत्ता) को
- ईक्षते
- देखता है,
- तत्
- उस
- ज्ञानम्
- ज्ञानको (तुम)
- सात्त्विकम्
- सात्त्विक
- विद्धि
- समझो।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी‘सर्वभूतेषु येनैकं...........अविभक्तंविभक्तेषु’—व्यक्ति, वस्तु आदिमें जो ‘है’ पन दीखता है, वह उन व्यक्ति, वस्तु आदिका नहीं है, प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्माका ही है। उन व्यक्ति, वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है; क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु आदि ऐसी नहीं है, जिसमें परिवर्तन न होता हो; परन्तु अपनी अज्ञता-(बेसमझी-)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है, ज्ञान हो जाता है, तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है, जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।
ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता— तेरहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता— तेरहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति आदिका अलग-अलग ज्ञान और यथायोग्य अलग-अलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वत:सिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्त:करणमें राग-द्वेष नहीं होते।
Verse 20 of 78 in chapter 18