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Indian PhilosophyOS

Chapter 18 · Verse 16

Bhagavad Gita 18.16

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु य:।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति:॥ १६॥

tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ।

paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ॥ 16॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता देखता है, वह दुष्ट बुद्धिवाला ठीक नहीं देखता; (क्योंकि) उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है अर्थात् उसने विवेकको महत्त्व नहीं दिया है।

English

Sadhaka-Sanjivani

Such being the case, a man of perverse understanding, who, on account of impure (untrained) mind, looks upon his pure self alone, as the doer, does not see right.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है, उसमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

तु
परन्तु
एवम्
ऐसे पाँच हेतुओंके
सति
होनेपर भी
य:
जो
तत्र
उस (कर्मोंके) विषयमें
केवलम्
केवल (शुद्ध)
आत्मानम्
आत्माको
कर्तारम्
कर्ता
पश्यति
देखता है,
स:
वह
दुर्मति:
दुष्ट बुद्धिवाला
न, पश्यति
ठीक नहीं देखता;
अकृतबुद्धित्वात्
(क्योंकि) उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है अर्थात् उसने विवेकको महत्त्व नहीं दिया है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~2 min read · 6 paragraphs

‘तत्रैवं सति........पश्यति दुर्मति:’— जितने भी कर्म होते हैं, वे सब अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव—इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है, उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है— ‘अकृतबुद्धित्वात्’ अर्थात् उसने विवेक-विचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड और चेतनका, प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है, अलगाव है, उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।

यहाँ आये ‘अकृतबुद्धित्वात्’ और ‘दुर्मति:’ पदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है। ‘अकृतबुद्धित्वात्’ पद हेतुके रूपमें आया है और ‘दुर्मति:’ पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता, तो वह दुर्मति नहीं रहता।

Verse 16 of 78 in chapter 18