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Indian PhilosophyOS

Chapter 17 · Verse 7

Bhagavad Gita 17.7

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय:।

यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥ ७॥

āhārastvapi sarvasya trividho bhavati priyaḥ।

yajñastapastathā dānaṃ teṣāṃ bhedamimaṃ śṛṇu॥ 7॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप (और) दान (भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी गुणोंको लेकर तीन प्रकारकी रुचि होती है,) (तू) उनके इस भेदको सुन।

English

Sadhaka-Sanjivani

The food, which is· dear to all, is also of three kinds. Even so are the sacrifices, austerities and charities. Hear thou, the distinction between these.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

अगर कोई मनुष्य किसी प्रकार भी यजन न करे, तो उसकी श्रद्धा कैसे पहचानी जायगी—इसे बतानेके लिये भगवान् आहारकी रुचिसे आहारीकी निष्ठाकी पहचानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

आहार:
आहार
अपि
भी
सर्वस्य
सबको
त्रिविध:
तीन प्रकारका
प्रिय:
प्रिय
भवति
होता है
तु
और
तथा
वैसे ही
यज्ञ:
यज्ञ,
तप:
तप (और)
दानम्
दान (भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी गुणोंको लेकर तीन प्रकारकी रुचि होती है,)
तेषाम्
(तू) उनके
इमम्
इस
भेदम्
भेदको
शृणु
सुन।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 6 paragraphs

‘आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवतिप्रिय:’—चौथे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनके प्रश्नके अनुसार मनुष्योंकी निष्ठाकी परीक्षाके लिये सात्त्विक, राजस और तामस—तीन तरहके यजन बताये। परन्तु जिसकी श्रद्धा, रुचि, प्रियता यजन-पूजनमें नहीं है, उनकी निष्ठाकी पहचान कैसे हो? इसके लिये बताया कि जिनकी यजन-पूजनमें श्रद्धा नहीं है, ऐसे मनुष्योंको भी शरीर-निर्वाहके लिये भोजन तो करना ही पड़ता है, चाहे वे नास्तिक हों, चाहे आस्तिक हों, चाहे वैदिक अथवा ईसाई, पारसी, यहूदी, यवन आदि किसी सम्प्रदायके हों। उन सबके लिये यहाँ ‘आहारस्त्वपि’ पद देकर कहा है कि निष्ठाकी पहचानके लिये केवल यजन-पूजन ही नहीं है, प्रत्युत भोजनकी रुचिसे ही उनकी निष्ठाकी पहचान हो जायगी।

मनुष्यका मन स्वाभाविक ही जिस भोजनमें ललचाता है अर्थात् जिस भोजनकी बात सुनकर, उसे देखकर और उसे चखकर मन आकृष्ट होता है, उसके अनुसार उसकी सात्त्विकी, राजसी या तामसी निष्ठा मानी जाती है।

Verse 7 of 28 in chapter 17