Skip to content
Indian PhilosophyOS

Chapter 17 · Verse 5(with 17.6)

Bhagavad Gita 17.5

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जना:।

दम्भाहङ्कारसंयुक्ता:

कामरागबलान्विता:॥ ५॥

aśāstravihitaṃ ghoraṃ tapyante ye tapo janāḥ।

dambhāhaṅkārasaṃyuktāḥ

kāmarāgabalānvitāḥ॥ 5॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी · 17.5–6

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; (जो) दम्भ और अहंकारसे अच्छी तरह युक्त हैं; (जो) भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; (जो) शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्त:करणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं, उन अज्ञानियोंको (तू) आसुर निष्ठावाले (आसुरी सम्पत्तिवाले) समझ।

English

Sadhaka-Sanjivani · 17.5–6

Those men who perform stem austerities, not enjoined by the scripture, due to hypocrisy and egoism, impelled by desire Oust) and attachment, who torment the elements, in their body, and Me, Who dwell in the body, know these senseless (ignorant) people, to be of demoniacal resolves.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

अबतक उन मनुष्योंकी बात बतायी, जो शास्त्रविधिको न जाननेके कारण उसका (अज्ञतापूर्वक) त्याग करते हैं; परन्तु अपने इष्ट तथा उसके यजन-पूजनमें श्रद्धा रखते हैं। अब, विरोधपूर्वक शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंकी क्रियाओंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

ये
जो
जना:
मनुष्य
अशास्त्र-विहितम्
शास्त्रविधिसे रहित
घोरम्
घोर
तप:
तप
तप्यन्ते
करते हैं;
दम्भाहङ्कार-संयुक्ता:
(जो) दम्भ और अहंकारसे अच्छी तरह युक्त हैं;
कामराग-बलान्विता:
(जो) भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं;
शरीरस्थम्
(जो) शरीरमें स्थित
भूतग्रामम्
पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको
च
तथा
अन्त:-शरीरस्थम्
अन्त:करणमें स्थित
माम्
मुझ परमात्माको
एव
भी
कर्शयन्त:
कृश करनेवाले हैं,
तान्
उन
अचेतस:
अज्ञानियोंको (तू)
आसुर-निश्चयान्
आसुर निष्ठावाले (आसुरी सम्पत्तिवाले)
विद्धि
समझ।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~4 min read · 8 paragraphs

‘अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जना:’— शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है, प्रत्युत निषेध है, ऐसे घोर तपको करनेमें उनकी रुचि होती है अर्थात् उनकी रुचि सदा शास्त्रसे विपरीत ही होती है। कारण कि तामसी बुद्धि (गीता—अठारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक) होनेसे वे स्वयं तो शास्त्रोंको जानते नहीं और दूसरा कोई बता भी दे तो वे न उसको मानना चाहते हैं तथा न वैसा करना ही चाहते हैं।

‘दम्भाहंकारसंयुक्ता:’—उनके भीतर यह बात गहरी बैठी हुई रहती है कि आज संसारमें जितने भजन, ध्यान, स्वाध्याय आदि करते हैं, वे सब दम्भ करते हैं, दम्भके बिना दूसरा कुछ है ही नहीं। अत: वे खुद भी दम्भ करते हैं। उनके भीतर अपनी बुद्धिमानीका, चतुराईका, जानकारीका अभिमान रहता है कि हम बड़े जानकार आदमी हैं; हमलोगोंको समझा सकते हैं, उनको रास्तेपर ला सकते हैं; हम शास्त्रोंकी बातें क्यों सुनें? हम कोई कम जानते हैं क्या? हमारी बातें सुनो तो तुम्हारेको पता चले; आदि-आदि।

Verse 5 of 28 in chapter 17