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Indian PhilosophyOS

Chapter 17 · Verse 26

Bhagavad Gita 17.26

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।

प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते॥ २६॥

sadbhāve sādhubhāve ca sadityetatprayujyate।

praśaste karmaṇi tathā sacchabdaḥ pārtha yujyate॥ 26॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

हे पार्थ! ‘सत्’— ऐसा यह परमात्माका नाम सत्तामात्रमें और श्रेष्ठ भावमें प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्मके साथ ‘सत्’ शब्द जोड़ा जाता है।

English

Sadhaka-Sanjivani

The word 'Sat' is used in the sense of Existence Absolute and saintliness; and so also, O Partha (Arjuna), the word 'Sat' is used, in the sense of a praise-worthy, act.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

चौबीसवें श्लोकमें ‘ॐ’ की और पचीसवें श्लोकमें ‘तत्’ शब्दकी व्याख्या करके अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें पाँच प्रकारसे ‘सत्’ शब्दकी व्याख्या करते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

पार्थ
हे पार्थ!
सत्
‘सत्’—
इति
ऐसा
एतत्
यह परमात्माका नाम
सद्भावे
सत्तामात्रमें
च
और
साधुभावे
श्रेष्ठ भावमें
प्रयुज्यते
प्रयोग किया जाता है
तथा
तथा
प्रशस्ते
प्रशंसनीय
कर्मणि
कर्मके साथ
सत्
‘सत्’
शब्द:
शब्द
युज्यते
जोड़ा जाता है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
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‘सद्भावे’—‘परमात्मा हैं’ इस प्रकार परमात्माकी सत्ता-(होनेपन-) का नाम ‘सद्भाव’ है। उस परमात्माके सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार आदि जितने रूप हैं और सगुण-साकारमें भी उसके विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि जितने अवतार हैं, वे सब-के-सब ‘सद्भाव’ के अन्तर्गत हैं। इस प्रकार जिसका किसी देश, काल, वस्तु आदिमें कभी अभाव नहीं होता, ऐसे परमात्माके जो अनेक रूप हैं, अनेक नाम हैं, अनेक तरहकी लीलाएँ हैं, वे सब-के-सब ‘सद्भाव’ के अन्तर्गत हैं। ‘साधुभावे’—परमात्मप्राप्तिके लिये अलग-अलग सम्प्रदायोंमें अलग-अलग जितने साधन बताये गये हैं, उनमें हृदयके जो दया, क्षमा आदि श्रेष्ठ, उत्तम भाव हैं, वे सब-के-सब ‘साधुभाव’ के अन्तर्गत हैं।

‘सदित्येतत्प्रयुज्यते’—सत्तामें और श्रेष्ठतामें ‘सत्’ शब्दका प्रयोग किया जाता है अर्थात् जो सदा है, जिसमें कभी किंचिन्मात्र भी कमी और अभाव नहीं होता—ऐसे परमात्माके लिये और उस परमात्माकी प्राप्तिके लिये दैवी-सम्पत्तिके जो सत्य, क्षमा, उदारता, त्याग आदि श्रेष्ठ गुण हैं, उनके लिये ‘सत्’ शब्दका प्रयोग किया जाता है; जैसे—सत्-तत्त्व, सद्गुण, सद्भाव आदि। ‘प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्द: पार्थ युज्यते’— परमात्मप्राप्तिके लिये अलग-अलग सम्प्रदायोंमें अलग-अलग जितने साधन बताये गये हैं, उनमें क्रियारूपसे जितने श्रेष्ठ आचरण हैं, वे सब-के-सब ‘प्रशस्ते कर्मणि’ के अन्तर्गत हैं। इसी प्रकार शास्त्रविधिके अनुसार यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कार; अन्नदान, भूमिदान, गोदान आदि दान; और कुआँ-बावड़ी खुदवाना, धर्मशाला बनवाना, मन्दिर बनवाना, बगीचा लगवाना आदि श्रेष्ठ कर्म भी ‘प्रशस्ते कर्मणि’ के अन्तर्गत आते हैं। इन सब श्रेष्ठ आचरणोंमें, श्रेष्ठ कर्मोंमें ‘सत्’ शब्दका प्रयोग किया जाता है; जैसे—सदाचार, सत्कर्म, सत्सेवा, सद्व्यवहार आदि।

Verse 26 of 28 in chapter 17