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Indian PhilosophyOS

Chapter 13 · Verse 9

Bhagavad Gita 13.9

असक्तिरनभिष्वङ्ग:

पुत्रदारगृहादिषु।

नित्यं

च

समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ ९॥

asaktiranabhiṣvaṅgaḥ

putradāragṛhādiṣu।

nityaṃ

ca

samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu॥ 9॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

आसक्तिरहित होना, पुत्र, स्त्री, घर आदिमें एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होना और अनुकूलता-प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें चित्तका नित्य सम रहना।

English

Sadhaka-Sanjivani

Non-attachment, non-identification of the self/with son, wife, home and the like and equanimity in all desirable and undesirable, happenings.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

असक्ति:
आसक्तिरहित होना,
पुत्रदार-गृहादिषु
पुत्र, स्त्री, घर आदिमें
अनभिष्वङ्ग:
एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होना
च
और
इष्टानिष्टोप-पत्तिषु
अनुकूलता-प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें
नित्यम्, समचित्तत्वम्
चित्तका नित्य सम रहना।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 7 paragraphs

‘असक्ति:’—उत्पन्न होनेवाली (सांसारिक) वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें जो प्रियता है, उसको ‘सक्ति’ कहते हैं। उस ‘सक्ति’से रहित होनेका नाम ‘असक्ति’ है।

सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिसे सुख लेनेकी इच्छासे, सुखकी आशासे और सुखके भोगसे ही मनुष्यकी उनमें आसक्ति, प्रियता होती है। कारण कि मनुष्यको संयोगके सिवाय सुख नहीं दीखता, इसलिये उसको संयोगजन्य सुख प्रिय लगता है। परन्तु वास्तविक सुख संयोगके वियोगसे होता है (गीता—छठे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), इसलिये साधकके लिये सांसारिक आसक्तिका त्याग करना बहुत आवश्यक है। उपाय—संयोगजन्य सुख आरम्भमें तो अमृतकी तरह दीखता है, पर परिणाममें विषकी तरह होता है (गीता— अठारहवें अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। संयोगजन्य सुख भोगनेवालेको परिणाममें दु:ख भोगना ही पड़ता है—यह नियम है। अत: संयोगजन्य सुखके परिणामपर दृष्टि रखनेसे उसमें आसक्ति नहीं रहती।

Verse 9 of 34 in chapter 13