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Indian PhilosophyOS

Chapter 13 · Verse 31

Bhagavad Gita 13.31

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय: ।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥ ३१॥

anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ ।

śarīrastho'pi kaunteya na karoti na lipyate॥ 31॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

हे कुन्तीनन्दन! यह (पुरुष स्वयं) अनादि होनेसे (और) गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है (और) न लिप्त होता है।

English

Sadhaka-Sanjivani

O Kaunteya, the self being without beginning and without attributes, is imperishable Paramatma (Supreme Soul), though dwelling in the body, it neither acts, nor is tainted.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

बाईसवें श्लोकमें जिसको देहसे पर बताया है और पीछेके (तीसवें) श्लोकमें जिसका ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है, उस पुरुष-(चेतन-) के वास्तविक स्वरूपका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

In the next verse, the Lord describes the self, to whom Brahma is attained, which has been mentioned in the preceding verse, and which in the twenty-second verse ofthis chapter, has been described, as detached from the body. aRrfffi1aTfsnalJT'(Cffinll:rT(qJl'-11«x;(Cf.: I

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

कौन्तेय
हे कुन्तीनन्दन!
अयम्
यह (पुरुष स्वयं)
अनादित्वात्
अनादि होनेसे (और)
निर्गुणत्वात्
गुणोंसे रहित होनेसे
अव्यय:
अविनाशी
परमात्मा
परमात्मस्वरूप ही है।
शरीरस्थ:
यह शरीरमें रहता हुआ
अपि
भी
न
न
करोति
करता है (और)
न
न
लिप्यते
लिप्त होता है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 5 paragraphs

‘अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय:’— इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको अनादि कहा है, उसीको यहाँ भी ‘अनादित्वात्’ पदसे अनादि कहा है अर्थात् यह पुरुष आदि-(आरम्भ-) से रहित है। अब प्रश्न होता है कि वहाँ तो प्रकृतिको भी अनादि कहा है, इसलिये प्रकृति और पुरुष—दोनोंमें क्या फरक रहा? इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘निर्गुणत्वात्’ अर्थात् यह पुरुष गुणोंसे रहित है। प्रकृति अनादि तो है, पर वह गुणोंसे रहित नहीं है, प्रत्युत गुणों और विकारोंवाली है। उससे सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण तथा विकार पैदा होते हैं। परन्तु पुरुष इन तीनों गुणों और विकारोंसे सर्वथा रहित (निर्गुण और निर्विकार) है। ऐसा यह पुरुष साक्षात् अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है अर्थात् यह पुरुष विनाशरहित परम शुद्ध आत्मा है।

‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’— यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न कुछ करता है और न किसी कर्मसे लिप्त ही होता है। तात्पर्य है कि इस पुरुष- (स्वयं-) ने न तो पहले किसी भी अवस्थामें कुछ किया है, न वर्तमानमें कुछ करता है और न आगे ही कुछ कर सकता है अर्थात् यह पुरुष सदासे ही प्रकृतिसे निर्लिप्त, असंग है तथा गुणोंसे रहित और अविनाशी है। इसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व है ही नहीं।

Verse 31 of 34 in chapter 13