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Indian PhilosophyOS

Chapter 12 · Verse 16

Bhagavad Gita 12.16

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय:॥ १६॥

anapekṣaḥ śucirdakṣa udāsīno gatavyathaḥ।

sarvārambhaparityāgī yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ॥ 16॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

जो अपेक्षा-(आवश्यकता-) से रहित, (बाहर-भीतरसे) पवित्र, चतुर, उदासीन, व्यथासे रहित (और) सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

English

Sadhaka-Sanjivani

sarvarambhaparityagl yo madbhaktah sa me priyah He, who has no expectation, is internally and externally pure, skilful, unconcerned and untroubled, renouncing all new action for pleasure and prosperity, he, My devotee is dear to Me.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

सिद्ध भक्तके छ: लक्षण बतानेवाला तीसरा प्रकरण आगेके श्लोकमें आया है।

In the third group, which consists of the next verse, the Lord describes six marks of, perfect devotees.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

य:
जो
अनपेक्ष:
अपेक्षा-(आवश्यकता-) से रहित,
शुचि:
(बाहर-भीतरसे) पवित्र,
दक्ष:
चतुर,
उदासीन:
उदासीन,
गतव्यथ:
व्यथासे रहित (और)
सर्वारम्भ-परित्यागी
सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है,
स:
वह
मद्भक्त:
मेरा भक्त
मे
मुझे
प्रिय:
प्रिय है।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~8 min read · 31 paragraphs

‘अनपेक्ष:’—भक्त भगवान्को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है। उसकी दृष्टिमें भगवत्प्राप्तिसे बढ़कर दूसरा कोई लाभ नहीं होता। अत: संसारकी किसी भी वस्तुमें उसका किंचिन्मात्र भी खिंचाव नहीं होता। इतना ही नहीं, अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धिमें भी उसका अपनापन नहीं रहता, प्रत्युत वह उनको भी भगवान्का ही मानता है, जो कि वास्तवमें भगवान्के ही हैं। अत: उसको शरीर-निर्वाहकी भी चिन्ता नहीं होती। फिर वह और किस बातकी अपेक्षा करे? अर्थात् फिर उसे किसी भी वस्तुकी इच्छा-वासना-स्पृहा नहीं रहती।

भक्तपर चाहे कितनी ही बड़ी आपत्ति आ जाय, आपत्तिका ज्ञान होनेपर भी उसके चित्तपर प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता। भयंकर-से-भयंकर परिस्थितिमें भी वह भगवान्की लीलाका अनुभव करके मस्त रहता है। इसलिये वह किसी प्रकारकी अनुकूलताकी कामना नहीं करता।

Verse 16 of 20 in chapter 12