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Indian PhilosophyOS

Chapter 11 · Verse 29

Bhagavad Gita 11.29

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा:।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा:॥ २९॥

yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ।

tathaiva nāśāya viśanti lokāstavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥ॥ 29॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

जैसे पतंगे (मोहवश) (अपना) नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी (मोहवश) (अपना) नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।

English

Sadhaka-Sanjivani

As moths out of their folly rush headlong into the burning fire for destruction, even so, do these people, hurriedly speed into Your mouths for their annihilation.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

जो राज्य और प्रशंसाके लोभसे युद्धमें आये हैं और जो सांसारिक संग्रह और भोगोंकी प्राप्तिमें लगे हुए हैं—ऐसे पुरुषोंका विराट्रूपमें पतंगोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।

Arjuna, in the next verse, describes those warriors who being engaged in worldlypleasures and prosperity,joined the war in order to gain praise and kingdom, illustrated by moths.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

यथा
जैसे
पतङ्गा:
पतंगे (मोहवश)
नाशाय
(अपना) नाश करनेके लिये
समृद्धवेगा:
बड़े वेगसे दौड़ते हुए
प्रदीप्तम्
प्रज्वलित
ज्वलनम्
अग्निमें
विशन्ति
प्रविष्ट होते हैं,
तथा
ऐसे
एव
ही
लोका:
ये सब लोग
अपि
भी (मोहवश)
नाशाय
(अपना) नाश करनेके लिये
समृद्धवेगा:
बड़े वेगसे दौड़ते हुए
तव
आपके
वक्त्राणि
मुखोंमें
विशन्ति
प्रविष्ट हो रहे हैं।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~2 min read · 3 paragraphs

‘यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्तिनाशाय समृद्धवेगा:’—जैसे हरी-हरी घासमें रहनेवाले पतंगे चातुर्मासकी अँधेरी रात्रिमें कहींपर प्रज्वलित अग्नि देखते हैं, तो उसपर मुग्ध होकर (कि बहुत सुन्दर प्रकाश मिल गया, हम इससे लाभ ले लेंगे, हमारा अँधेरा मिट जायगा) उसकी तरफ बड़ी तेजीसे दौड़ते हैं। उनमेंसे कुछ तो प्रज्वलित अग्निमें स्वाहा हो जाते हैं; कुछको अग्निकी थोड़ी-सी लपट लग जाती है तो उनका उड़ना बंद हो जाता है और वे तड़पते रहते हैं। फिर भी उनकी लालसा उस अग्निकी तरफ ही रहती है! यदि कोई पुरुष दया करके उस अग्निको बुझा देता है तो वे पतंगे बड़े दु:खी हो जाते हैं कि उसने हमारेको बड़े लाभसे वंचित कर दिया!

‘तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणिसमृद्धवेगा:’—भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही तत्परतापूर्वक लगे रहना और मनमें भोगों और संग्रहका ही चिन्तन होते रहना—यह बढ़ा हुआ सांसारिक वेग है। ऐसे वेगवाले दुर्योधनादि राजालोग पतंगोंकी तरह बड़ी तेजीसे कालचक्ररूप आपके मुखोंमें जा रहे हैं अर्थात् पतनकी तरफ जा रहे हैं—चौरासी लाख योनियों और नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि प्राय: मनुष्य सांसारिक भोग, सुख, आराम, मान, आदर आदिको प्राप्त करनेके लिये रात-दिन दौड़ते हैं। उनको प्राप्त करनेमें उनका अपमान होता है, निन्दा होती है, घाटा लगता है, चिन्ता होती है, अन्त:करणमें जलन होती है और जिस आयुके बलपर वे जी रहे हैं, वह आयु भी समाप्त होती जाती है, फिर भी वे नाशवान् भोग और संग्रहकी प्राप्तिके लिये भीतरसे लालायित रहते हैं*।

Verse 29 of 55 in chapter 11