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Indian PhilosophyOS

Chapter 10 · Verse 36

Bhagavad Gita 10.36

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ ३६॥

dyūtaṃ chalayatāmasmi tejastejasvināmaham।

jayo'smi vyavasāyo'smi sattvaṃ sattvavatāmaham॥ 36॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

छल करनेवालोंमें जुआ (और) तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। (जीतनेवालोंकी) विजय मैं हूँ। (निश्चय करने-वालोंका) निश्चय (और) सात्त्विक मनुष्योंका सात्त्विक भाव मैं हूँ।

English

Sadhaka-Sanjivani

The English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

छलयताम्
छल करनेवालोंमें
द्यूतम्
जुआ (और)
तेजस्विनाम्
तेजस्वियोंमें
तेज:
तेज
अहम्
मैं
अस्मि
हूँ।
जय:
(जीतनेवालोंकी) विजय
अस्मि
मैं हूँ।
व्यवसाय:
(निश्चय करने-वालोंका) निश्चय
सत्त्ववताम्
(और) सात्त्विक मनुष्योंका
सत्त्वम्
सात्त्विक भाव
अहम्
मैं
अस्मि
हूँ।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 13 paragraphs

‘द्यूतं छलयतामस्मि’—छल करके दूसरोंके राज्य, वैभव, धन, सम्पत्ति आदिका (सर्वस्वका) अपहरण करनेकी विशेष सामथ्र्य रखनेवाली जो विद्या है, उसको जूआ कहते हैं। इस जूएको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

शंका—यहाँ भगवान्ने छल करनेवालोंमें जूएको अपनी विभूति बताया है तो फिर इसके खेलनेमें क्या दोष है? अगर दोष नहीं है तो फिर शास्त्रोंने इसका निषेध क्यों किया है। समाधान—‘ऐसा करो और ऐसा मत करो’—यह शास्त्रोंका विधि-निषेध कहलाता है। ऐसे विधि-निषेधका वर्णन यहाँ नहीं है। यहाँ तो विभूतियोंका वर्णन है। ‘मैं आपका चिन्तन कहाँ-कहाँ करूँ?’—अर्जुनके इस प्रश्नके अनुसार भगवान्ने विभूतियोंके रूपमें अपने चिन्तनकी बात ही बतायी है अर्थात् भगवान्का चिन्तन सुगमतासे हो जाय, इसका उपाय विभूतियोंके रूपमें बताया है। अत: जिस समुदायमें मनुष्य रहता है, उस समुदायमें जहाँ दृष्टि पड़े, वहाँ संसारको न देखकर भगवान्को ही देखे; क्योंकि भगवान् कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरेसे व्याप्त है अर्थात् इस जगत्में मैं ही व्याप्त हूँ, परिपूर्ण हूँ (गीता— नवें अध्यायका चौथा श्लोक)।

Verse 36 of 42 in chapter 10