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Indian PhilosophyOS

Chapter 10 · Verse 2

Bhagavad Gita 10.2

न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय:।

अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश:॥ २॥

na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ।

ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ॥ 2॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं (और) न महर्षि; क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओंका और महर्षियोंका आदि हूँ।

English

Sadhaka-Sanjivani

The English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.

How this verse follows from the lastसम्बन्ध

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

परम वचनके विषयमें, जिसे मैं आगे कहूँगा, मेरे सिवाय पूरा-पूरा बतानेवाला अन्य कोई नहीं मिल सकता। इसका कारण क्या है? इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

मे
मेरे
प्रभवम्
प्रकट होनेको
न
न
सुरगणा:
देवता
विदु:
जानते हैं (और)
न
न
महर्षय:
महर्षि;
हि
क्योंकि
अहम्
मैं
सर्वश:
सब प्रकारसे
देवानाम्
देवताओंका
च
और
महर्षीणाम्
महर्षियोंका
आदि:
आदि हूँ।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~3 min read · 10 paragraphs

‘न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय:’— यद्यपि देवताओंके शरीर, बुद्धि, लोक, सामग्री आदि सब दिव्य हैं, तथापि वे मेरे प्रकट होनेको नहीं जानते। तात्पर्य है कि मेरा जो विश्वरूपसे प्रकट होना है, मत्स्य, कच्छप आदि अवताररूपसे प्रकट होना है, सृष्टिमें क्रिया, भाव और विभूतिरूपसे प्रकट होना है, ऐसे मेरे प्रकट होनेके उद्देश्यको, लक्ष्यको, हेतुओंको देवता भी पूरा-पूरा नहीं जानते। मेरे प्रकट होनेको पूरा-पूरा जानना तो दूर रहा, उनको तो मेरे दर्शन भी बड़ी कठिनतासे होते हैं। इसलिये वे मेरे दर्शनके लिये हरदम लालायित रहते हैं (गीता— ग्यारहवें अध्यायके बावनवें श्लोकमें)।

ऐसे ही जिन महर्षियोंने अनेक ऋचाओंको, मन्त्रोंको,

Verse 2 of 42 in chapter 10