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Indian PhilosophyOS

Chapter 1 · Verse 41

Bhagavad Gita 1.41

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:।

स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसङ्कर:॥ ४१॥

adharmābhibhavātkṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ।

strīṣu duṣṭāsu vāṣrṇeya jāyate varṇasaṅkaraḥ॥ 41॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी

हे कृष्ण! अधर्मके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं (और) हे वाष्र्णेय! स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाता है*। पुरुष और दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाते हैं।

English

Sadhaka-Sanjivani

The English edition’s translation of this verse could not be recovered reliably from the scan. Please rely on the Hindi translation and the word-by-word meanings.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

कृष्ण
हे कृष्ण!
अधर्माभिभवात्
अधर्मके अधिक बढ़ जानेसे
कुलस्त्रिय:
कुलकी स्त्रियाँ
प्रदुष्यन्ति
दूषित हो जाती हैं (और)
वाष्र्णेय
हे वाष्र्णेय!
स्त्रीषु
स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाता है*। पुरुष और
दुष्टासु
दूषित होनेपर
वर्णसङ्कर:
वर्णसंकर
जायते
पैदा हो जाते हैं।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~1 min read · 5 paragraphs

‘अधर्माभिभवात्कृष्णप्रदुष्यन्तिकुलस्त्रिय:’—धर्मका पालन करनेसे अन्त:करण शुद्ध हो जाता है। अन्त:करण शुद्ध होनेसे बुद्धि सात्त्विकी बन जाती है। सात्त्विकी बुद्धिमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसका विवेक जाग्रत् रहता है। परन्तु जब कुलमें अधर्म बढ़ जाता है, तब आचरण अशुद्ध होने लगते हैं, जिससे अन्त:करण अशुद्ध हो जाता है। अन्त:करण अशुद्ध होनेसे बुद्धि तामसी बन जाती है। बुद्धि तामसी होनेसे मनुष्य अकर्तव्यको कर्तव्य और कर्तव्यको अकर्तव्य मानने लग जाता है अर्थात् उसमें शास्त्र-मर्यादासे उलटी बातें पैदा होने लग जाती हैं। इस विपरीत बुद्धिसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित अर्थात् व्यभिचारिणी हो जाती हैं।

‘स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसङ्कर:’—स्त्रियोंके स्त्री—दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो संतान पैदा होती है, वह ‘वर्णसंकर’ कहलाती है।

Verse 41 of 47 in chapter 1