Chapter 1 · Verse 33
Bhagavad Gita 1.33
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥ ३३॥
yeṣāmarthe kāṅkṣitaṃ no rājyaṃ bhogāḥ sukhāni ca।
ta ime'vasthitā yuddhe prāṇāṃstyaktvā dhanāni ca॥ 33॥
हिन्दी
साधक-संजीवनीजिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे (ही) ये सब (अपने) प्राणोंकी हमें न प्राणोंका मोह है और न धनकी तृष्णा है; हम मर बेशक जायँ, पर युद्धसे नहीं हटेंगे। अगर ये सब मर ही और धनकी आशाका त्याग करके युद्धमें खड़े हैं।
English
Sadhaka-SanjivaniThose, for whose sake we seek kingdom, enjoyment and pleasure, are here, arrayed on the battlefield, staking their lives and property.
How this verse follows from the lastसम्बन्ध
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीअर्जुन विजय आदि क्यों नहीं चाहते, इसका हेतु आगेके श्लोकमें बताते हैं।
Word by wordशब्दार्थ
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनीSwamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।
- येषाम्
- जिनके
- अर्थे
- लिये
- न:
- हमारी
- राज्यम्
- राज्य,
- भोगा:
- भोग
- च
- और
- सुखानि
- सुखकी
- काङ्क्षितम्
- इच्छा है,
- ते
- वे (ही)
- इमे
- ये सब (अपने)
- प्राणान्
- प्राणोंकी हमें न प्राणोंका मोह है और न धनकी तृष्णा है; हम मर बेशक जायँ, पर युद्धसे नहीं हटेंगे। अगर ये सब मर ही
- च
- और
- धनानि
- धनकी आशाका
- त्यक्त्वा
- त्याग करके
- युद्धे
- युद्धमें
- अवस्थिता:
- खड़े हैं।
A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .
From the commentaryव्याख्यासे
Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी‘येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा:सुखानि च’—हम राज्य, सुख, भोग आदि जो कुछ चाहते हैं, उनको अपने व्यक्तिगत सुखके लिये नहीं चाहते, प्रत्युत इन कुटुम्बियों, प्रेमियों, मित्रों आदिके लिये ही चाहते हैं। आचार्यों, पिताओं, पितामहों, पुत्रों आदिको सुख-आराम पहुँचे, इनकी सेवा हो जाय, ये प्रसन्न रहें—इसके लिये ही हम युद्ध करके राज्य लेना चाहते हैं, भोग-सामग्री इक_ी करना चाहते हैं।
‘त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च’— पर वे ही ये सब-के-सब अपने प्राणोंकी और धनकी आशाको छोड़कर युद्ध करनेके लिये हमारे सामने इस रणभूमिमें खड़े हैं। इन्होंने ऐसा विचार कर लिया है कि जायँगे, तो फिर हमें राज्य किसके लिये चाहिये? सुख किसके लिये चाहिये? धन किसके लिये चाहिये? अर्थात् इन सबकी इच्छा हम किसके लिये करें?
Verse 33 of 47 in chapter 1