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Indian PhilosophyOS

Chapter 1 · Verse 30(with 1.28, 1.29)

Bhagavad Gita 1.30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन:॥ ३०॥

gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate।

na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ॥ 30॥

हिन्दी

साधक-संजीवनी · 1.28–30

हे कृष्ण! युद्धकी इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदायको अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीरमें कँपकँपी (आ रही है) एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथसे गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो (१। २८)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही रहा है और (मैं) खड़े रहनेमें भी असमर्थ हो रहा हूँ।

English

Sadhaka-Sanjivani · 1.28–30

O K"n.a, at the sight of these kinsmen thus arrayed here, eager to wage war, my limbs give waY,my mouth is parched, my body shivers and hair stand on end. The bow, Gandiva slips from my hand, my skin burns all over. My mind is reeling as it were and I am not able even, to stand.

Word by wordशब्दार्थ

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी

Swamiji’s word meanings, in the order he reads the verse. Read them in sequence and they form the Hindi translation.स्वामीजीके अन्वयके क्रमसे शब्दार्थ — क्रमसे पढ़नेपर यही अनुवाद बनता है।

कृष्ण
हे कृष्ण!
युयुत्सुम्
युद्धकी इच्छावाले
इमम्
इस
स्वजनम्
कुटुम्ब-समुदायको
समुपस्थितम्
अपने सामने उपस्थित
दृष्ट्वा
देखकर
मम
मेरे
गात्राणि
अंग
सीदन्ति
शिथिल हो रहे हैं
च
और
मुखम्
मुख
परिशुष्यति
सूख रहा है
च
तथा
मे
मेरे
शरीरे
शरीरमें
वेपथु:
कँपकँपी (आ रही है)
च
एवं
रोमहर्ष:
रोंगटे खड़े
जायते
हो रहे हैं।
हस्तात्
हाथसे
गाण्डीवम्
गाण्डीव धनुष
स्रंसते
गिर रहा है
च
और
त्वक्
त्वचा
एव
भी
परिदह्यते
जल रही है।
मे
मेरा
मन:
मन
भ्रमति, इव
भ्रमित-सा हो (१। २८)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही रहा है
च
और (मैं)
अवस्थातुम्
खड़े रहनेमें
च
भी
न, शक्नोमि
असमर्थ हो रहा हूँ।

A simplified explanation for this verse hasn’t been written yet. Everything here is the text of Sadhak Sanjivani itself — the full commentary is one tap away in .

From the commentaryव्याख्यासे

Source · Sadhak Sanjivaniमूल · साधक-संजीवनी
~2 min read · 4 paragraphs

‘दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्’— अर्जुनको ‘कृष्ण’ नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें नौ बार आया है। भगवान् श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवान्को अर्जुनका ‘पार्थ’ नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान् और अर्जुन आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे संजयने गीताके अन्तमें ‘कृष्ण’ और ‘पार्थ’ नामका उल्लेख किया है—‘यत्रयोगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:’ (१८। ७८)।

धृतराष्ट्रने पहले ‘समवेता युयुत्सव:’ कहा था और यहाँ अर्जुनने भी ‘युयुत्सुं समुपस्थितम्’ कहा है; परन्तु दोनोंकी दृष्टियोंमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके पुत्र हैं—ऐसा भेद है; अत: धृतराष्ट्रने वहाँ ‘मामका:’ और ‘पाण्डवा:’ कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं है; अत: अर्जुनने यहाँ ‘स्वजनम्’ कहा है, जिसमें दोनों पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मरे, पर वह है तो हमारा ही कुटुम्बी।

Verse 30 of 47 in chapter 1